पॉल्ट्रि फार्मिंग  (मुर्गी पालन)

Poultry Farming in Hindi, पॉल्ट्रि फार्मिंग, मुर्गी पालन, कुक्कुट फार्म प्रबंधन

पॉल्ट्रि फार्मिंग  (मुर्गी पालन)

पॉल्ट्रि फार्मिंग का अर्थ अण्डे तथा माँस के लिए मुर्गी, बतख, गीज,टर्की तथा फेजन्ट (चेड) का पालन करना है।

भारत तथा पड़ौसी देश लाल जंगली मुर्गे (गेलस गेलस) के वास्तविक घर के रूप में माने जाते हैं। प्रमाण है, कि 2000 वर्ष पूर्वी मध्य से असील या मलय मुर्गे यूरोप ले जाए गए जो वर्तमान में यूरोपीयन नस्ले उत्पन्न करते हैं।

पॉल्ट्रि फार्मिंग के उद्देश्य

  1. पॉल्ट्रि तथा पॉल्ट्रि उत्पाद जन्तु प्रोटीन तथा अन्य पोषकों जैसे वसा, विटामिन तथा खनिजों के प्रचुर स्त्रोत ही भारत में अण्डों का उपयोग बच्चों में प्रोटीन की कमी को दूर करने में किया जाता है।
  2. पॉल्ट्रि पक्षी आसानी से वृद्धि करते हैं, तथा जलवायु परिस्थितियों की परासता को सहन कर सकते हैं, इनका जीवनकाल अल्प होता है।
  3. मुर्गी प्रतिवर्ष औसतन 60 अण्डे देती है। (अधिक उत्पादन करने वाली किस्मों में 240 अण्डे)। पॉ
  4. ल्ट्रि-फार्मिंग में कम अवकाश की आवश्यकता होती है। तथा इनको प्रबन्धित तथा बनाएँ रखना आसान है।

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कुक्कुट फार्म प्रबंधन

कुक्कुट फार्म प्रबंधन निम्न लिखित चरणों की जानकारी होती है-

आवास

पॉल्ट्रि फार्म में आरामदायक, सुवातायित शुष्क घर होने चाहिए। अलग-अलग आयु के पक्षियों को अलग-अलग घरों में रखा जाता है। औसत जलवायु युक्त क्षैत्र में इन्हें बंहमे (कूप) में रखा जाता है। फर्श में स्ट्रा, चावल का भूसा, शुष्क पत्तियाँ या मूँगफली, बीजों के छिलके डाले जाते हैं। यह चूहा रोधी बनाया जाता है।

आहार

पॉल्ट्रि आहार में सभी पोषक सम्मिलित है, जिसमें अनाज, बाजरा, तेल केक, प्रोटीन सान्द्रता, मछली तथा माँस, खनिज तथा हरी सब्जियाँ आदि होते हैं।

कैल्सियम, फॉस्फोरस, सोडियम, कॉपर, आयोडिन, आयरन मैंग्नीज तथा जिंक आदि खनिज पॉल्ट्रि आहार के लिए महत्वपूर्ण हैं।

आवश्यक विटामिन A (रेटीनॉल), B1 (थाइमिन), B6 (पाइरिडॉक्सिन), B2 (राइबोफ्लेविन), B5 (पेन्टोथोनिक अम्ल), B3 (नियासिन), B9 (फॉलिक अम्ल), B12 (मेथाइलकोबालेमीन )आदि आहार में उपस्थित होने चाहिए।

संतुलित आहार के उपभोग से ऊत्तक तथा अण्डों का उत्पादन अधिकतम होता है। साफ तथा ताजा जल पक्षियों के लिए बहुत अनिवार्य है।

प्रकाश प्रबन्धन

अधिक अण्डों के उत्पादन के लिए प्रकाश अनिवार्य है। अधिक उत्पादन के लिए 14 से 16 घण्टों के प्रकाश की आवश्यकता होती है। जब पुलेट (अण्डे देने वाली स्थिति में मुर्गी) अण्डे देने वाली होती है, तो इसे अतिरिक्त प्रकाश (लगभग 12 घण्टे से कम) दिया जाता है।

कृमिक रूप से प्रत्येक सप्ताह 20 मिनट प्रकाश अवधि बढ़ाई जाती है, जिसे कुल प्रकाश के 16 घण्टे तक पहुँचा दिया जाता है। 20 वाट की एक ट्युबलाइट 36 sq.m क्षैत्र के लिए पर्याप्त है, जब 40 वाट का बल्ब 18 sq.m क्षैत्र के लिए पर्याप्त है। प्रकाश एक समान रूप से वितरीत होना चाहिये। प्रकाश पुरी रात के लिए प्रदान नहीं किया जाना चाहिये।

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मुर्गीयों की नस्लें

एशियाटिक नस्ले

ब्रह्मा, असील, कोचिन, लैंगरहेन्स (ब्लेक), एन्डेलुसियन (नीली)

अमेरिकन नस्ले

प्लाइमाउथ रॉक, न्यू हेम्पशायर, रोड आइलैण्ड रेड, जर्सी ब्लेक जायन्ट, वायानडॉट

इंग्लिश नस्ले

ऑस्ट्रेलॉर्प, ऑर्पिन्गटन (बफ तथा श्वेत),     कॉर्निश, डॉर्किन्ग

मेडिटेरीयन नस्ले

मिनोर्का, व्हाइट लेगहॉर्न, एन्कॉना

घरेलू मुर्गे (गेलस डोमेस्टिकस) हमारे देश में दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है-

  1. इन्डिजीनस (देशी प्रकार)
  2. एक्जोटिक (बेहतर प्रकार)

 

कुछ इन्डिजीनस नस्लों जैसे एसील, घेगस, ब्रह्मा अच्छी नस्लें है।

एसील मुर्गे, मुर्गों को लड़ाने (मुर्गा प्रतिस्पर्धा) में उपयोगी है।

एक्जोटिक नस्लों को उनके उत्पत्ति के स्त्रोत के अनुसार अमेरिकन वर्ग, इंग्लिश वर्ग, मेडिटीरीयन वर्ग तथा एशियाटिक वर्ग में विभाजित किया गया है।

कुछ उदाहरण श्वेत लेग हॉर्न, रोड आइलैण्ड रेड, प्लाईमाउथ रोक तथा न्यू हेम्पशायर है। ये अब भारतीय परिस्थितियों के लिए अब पूर्णतया अनुकूलित हो गई है। इनमें से कुछ अधिक अण्डे देने वाले हैं, तो दूसरे अधिक माँस देने वाले हैं।

 

प्रजनन

अण्डा उत्पादन बढ़ाने के लिए इन्डिजीनस नस्लों को एक्जोटिक नस्लों के साथ क्रॉस कराया जाता है। हेटेरोसिस अच्छे अण्डे उत्पादन व ब्रॉइलर उत्पादन हेतु उपयोगी हो चुका है, जिसमें उच्च पोषक गुणवत्ता होती है।

 

कुछ रोग जैसे मुर्गा पॉक्स, रानिखेत, कोराइजा, मुर्गा कोलेरा तथा एस्परजिलोसिस पॉल्ट्रि पर अधिक हानि करते हैं। लेकिन अच्छे प्रबन्धन, पूर्ण आवास तथा पोषण व चूजों के समय-समय पर टीकाकरण के साथ ये रोग नियंत्रित हो सकते हैं। ये भारत के दक्षिणी व पूर्वी भागों में अत्यधिक होते हैं। बतखों की 20 नस्ले हैं, जिनमें से मस्कोरि, पेकिन एलेस्बरी तथा केम्पबैल लोकप्रिय बाहरी (विदेशी) नस्ले है, इंडिजीनस नस्लों में भारतीय रनर, सायहेल्ट मेटा सम्मिलित हैं। भूरी तथा श्वेत गीज भारत में प्रमुख है। टर्की जिसकी क्रिस्मस के समय मांग होती है, जो नारफॉल्ड, ब्रिटिश श्वेत, ब्रोड ब्रीसटेड ब्रोन्ज तथा बेल्टविल छोटी श्वेत से सम्बन्धित है।

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पॉल्ट्रि रोग

जीवाण्वीय रोग

रोग मुर्गा क्लोलेरा

रोगकारक पाश्चुरेला

रोग पुलोरम

रोगकारक साल्मोनेला पुलोरम

रोग  माइकोप्लाज्मोसिस

रोगकारक माइकोप्लाज्मा गेलिसेप्टिकम

रोग स्पाइरोकीटोसिस

रोगकारक स्पाइरोकीट

विषाण्वीय रोग

बर्ड फ्लू, रानिखेत, फाउल पॉक्स, संक्रमित ब्रॉन्काइटिस, लिम्फोइड ल्यूकोसिस।

रानिखेत रोग श्वसन रोग है, जो पेरामिक्सो विषाणु द्वारा होता है, तथा खाँसी, छींक तथा श्वसन सम्बन्धित रोगों द्वारा अभिलक्षित होता है। इसे ‘New Castle disease भी कहते हैं।

बर्ड फ्लू इनफ्लुएन्जा के समान ही है, तथा H1N1 विषाणु द्वारा होता है। विषाणु मुर्गीयों द्वारा मनुष्य करता है।

कवकीय रोग

ट्रश, एफ्लेटॉक्सिकोसिस, ब्रूडर प्रीयुमोनिया

एनसीफेलोमेलेसिया

विटामिन म् की कमी छोटी पॉल्ट्रि में मस्तिष्क ऊत्तक की कोमलता करती है।

कॉक्सिडियोसिस

आइमेरिया प्रोटोजोआ मुर्गों में कॉक्सिडियोसिस रोग पैदा करता है। इसमें रक्त वाले दस्त होते हैं।

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Hamid Ali
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