विद्यालय शिक्षा का एक महत्वपूर्ण औपचारिक संस्थान है, जहाँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए विभिन्न शैक्षिक गतिविधियों का संचालन किया जाता है। विद्यालय की सफलता केवल भवन, फर्नीचर, तकनीकी उपकरणों एवं अन्य भौतिक संसाधनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वहाँ कार्यरत मानवीय संसाधनों (Human Resources) की कार्यक्षमता, योग्यता, सहयोग एवं प्रभावी प्रबंधन पर भी निर्भर करती है।
विद्यालय में प्रधानाध्यापक (Headmaster/Principal), शिक्षक (Teachers), उपप्रधानाध्यापक (Vice Principal), पुस्तकालयाध्यक्ष (Librarian), शारीरिक शिक्षा शिक्षक (Physical Education Teacher), कार्यालय कर्मचारी (Administrative Staff) तथा अन्य सहायक कर्मचारी मानवीय संसाधनों के प्रमुख अंग हैं।
विद्यालय एक ऐसी संस्था है जहाँ मानवीय संसाधनों के माध्यम से मानव का निर्माण किया जाता है। इसलिए विद्यालय में मानवीय संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है।
मानवीय संसाधनों का अर्थ एवं अवधारणा (Meaning and Concept of Human Resources)
मानवीय संसाधन (Human Resources) से आशय किसी संस्था में कार्यरत उन व्यक्तियों से है, जो अपने ज्ञान, कौशल, अनुभव, योग्यता एवं कार्यक्षमता के माध्यम से संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति में योगदान देते हैं।
विद्यालय के संदर्भ में मानवीय संसाधन उन सभी व्यक्तियों को सम्मिलित करते हैं, जो शिक्षण, प्रशासन, अनुशासन, मार्गदर्शन एवं विद्यालय की अन्य गतिविधियों के संचालन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देते हैं।
मानवीय संसाधन प्रबंधन (Human Resource Management—HRM) वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत कर्मचारियों की नियुक्ति, कार्य-विभाजन, प्रशिक्षण, प्रेरणा, मूल्यांकन तथा विकास के माध्यम से विद्यालय के उद्देश्यों को प्राप्त किया जाता है।
विद्यालय में मानवीय संसाधनों के प्रमुख घटक (Components of Human Resources)
विद्यालय में निम्नलिखित प्रमुख मानवीय संसाधन सम्मिलित होते हैं—
- प्रधानाध्यापक (Principal/Headmaster)
- उपप्रधानाध्यापक (Vice Principal)
- शिक्षक एवं शिक्षिकाएँ (Teachers)
- शारीरिक शिक्षा शिक्षक (Physical Education Teacher)
- पुस्तकालयाध्यक्ष (Librarian)
- प्रयोगशाला सहायक (Laboratory Assistant)
- कार्यालय कर्मचारी (Administrative Staff)
- लिपिक (Clerk)
- चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (Class IV Employees)
- सुरक्षा एवं अन्य सहायक कर्मचारी (Support Staff)
विद्यालय में मानवीय संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन के आवश्यक चरण (Steps for Effective Human Resource Management)
1. स्वस्थ एवं सहयोगात्मक विद्यालय वातावरण का निर्माण (Creating a Positive School Environment)
विद्यालय में ऐसा वातावरण विकसित करना चाहिए, जिसमें प्रत्येक कर्मचारी को अपने व्यावसायिक जीवन में प्रगति करने तथा अपनी क्षमताओं का विकास करने के अवसर प्राप्त हों।
एक सकारात्मक विद्यालय वातावरण (Positive School Climate) कर्मचारियों में सहयोग, विश्वास, उत्तरदायित्व एवं कार्य के प्रति प्रतिबद्धता को बढ़ाता है।
2. कार्यक्षमता एवं सृजनात्मकता की पहचान (Identifying Efficiency and Creativity)
प्रधानाध्यापक को विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों की कार्यक्षमता, योग्यता, रुचि तथा सृजनात्मकता की पहचान करनी चाहिए।
इसके आधार पर विद्यालय के उद्देश्यों के अनुरूप विभिन्न कार्यों का वितरण करना चाहिए, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे सके।
3. प्रधानाध्यापक की भूमिका (Role of the Principal)
विद्यालय में मानवीय एवं भौतिक संसाधनों के प्रबंधन की प्रमुख जिम्मेदारी प्रधानाध्यापक की होती है।
प्रधानाध्यापक को निम्नलिखित कार्य करने चाहिए—
- विद्यालय के उद्देश्यों एवं कार्ययोजना का निर्धारण करना।
- शिक्षकों एवं कर्मचारियों के बीच कार्यों का उचित विभाजन करना।
- शिक्षकों को प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना।
- कर्मचारियों के व्यावसायिक विकास के अवसर उपलब्ध कराना।
- विद्यालय में अनुशासन एवं सहयोगात्मक वातावरण बनाए रखना।
- शैक्षिक गतिविधियों की निगरानी एवं मूल्यांकन करना।
4. शिक्षकों का सम्मान एवं व्यावसायिक विकास (Professional Development)
प्रभावी प्रबंधन के लिए आवश्यक है कि प्रधानाध्यापक अपने शिक्षकों की योग्यता, अनुभव एवं कार्यक्षमता का सम्मान करें।
शिक्षकों को प्रशिक्षण (Training), कार्यशालाओं (Workshops), सेमिनार (Seminars) तथा अन्य व्यावसायिक विकास कार्यक्रमों में भाग लेने के अवसर प्रदान करने चाहिए।
इससे शिक्षकों की कार्यक्षमता, आत्मविश्वास एवं शिक्षण गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
विद्यालय में भौतिक संसाधनों का प्रबंधन (Management of Physical Resources)
विद्यालय के भौतिक संसाधन (Physical Resources) वे सभी वस्तुएँ एवं सुविधाएँ हैं, जो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाने में सहायता करती हैं।
इनमें विद्यालय भवन, कक्षाएँ, फर्नीचर, शैक्षिक सामग्री, प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, खेल का मैदान तथा तकनीकी उपकरण आदि सम्मिलित हैं।
1. विद्यालय भवन (School Building)
विद्यालय भवन में निम्नलिखित कक्ष एवं सुविधाएँ होनी चाहिए—
- प्रधानाचार्य एवं कार्यालय कक्ष (Principal’s Office)
- उपप्रधानाचार्य कक्ष (Vice Principal’s Office)
- शिक्षक कक्ष (Staff Room)
- कक्षा-कक्ष (Classrooms)
- आगंतुक कक्ष (Visitor’s Room)
- परीक्षा कक्ष (Examination Room)
- परामर्श कक्ष (Counselling Room)
- पुस्तकालय (Library)
- प्रयोगशाला (Laboratory)
- खेल का मैदान (Playground)
- छात्र-छात्राओं के लिए विश्राम कक्ष (Rest Room)
- व्याख्यान कक्ष (Lecture Hall)
डॉ. एस. एन. मुखर्जी के अनुसार, विद्यालय भवन को पढ़ाई के घंटों के मध्य बालकों का घर समझा जाना चाहिए। इसे प्रयोगशाला के रूप में विकसित करना चाहिए तथा नागरिकों के साहस एवं व्यक्तित्व विकास का केंद्र भी होना चाहिए।
2. फर्नीचर एवं बैठने की व्यवस्था (Furniture and Seating Arrangement)
रायबर्न (Rayburn) के अनुसार, “एकहरी डेस्क दोहरी डेस्कों से अच्छी होती हैं।”
विद्यालय में फर्नीचर की व्यवस्था करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए—
- डेस्क एवं बेंच विद्यार्थियों की आयु के अनुसार होनी चाहिए।
- विद्यार्थियों की दृष्टि एवं शारीरिक संरचना के अनुकूल व्यवस्था होनी चाहिए।
- डेस्कों की संख्या आवश्यकता के अनुसार होनी चाहिए।
- प्रत्येक विद्यार्थी को पर्याप्त स्थान एवं सुविधा मिलनी चाहिए।
- डेस्क ऐसी होनी चाहिए, जिससे शिक्षक विद्यार्थियों की गतिविधियों का निरीक्षण कर सकें।
3. कक्षा-कक्ष की व्यवस्था (Classroom Arrangement)
कक्षा-कक्ष का वातावरण शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इसलिए कक्षा में पर्याप्त प्रकाश, वायु-संचार, स्वच्छता तथा उचित बैठने की व्यवस्था होनी चाहिए।
कक्षा में विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था इस प्रकार होनी चाहिए कि शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी पर ध्यान दे सके तथा विद्यार्थी भी शिक्षक के साथ सहज संवाद कर सकें।
विद्यालय के प्रमुख शैक्षिक संसाधन (Educational Resources)
1. श्यामपट्ट (Blackboard)
श्यामपट्ट विद्यालय के सबसे महत्वपूर्ण शिक्षण उपकरणों में से एक है। इसका प्रयोग अधिकांश विद्यालयों में किया जाता है।
श्यामपट्ट के प्रमुख प्रकार हैं—
- दीवार श्यामपट्ट (Wall Blackboard)
- लकड़ी का श्यामपट्ट (Wooden Blackboard)
2. श्यामपट्ट का रंग (Colour of Blackboard)
रायबर्न के अनुसार, अधिकांश कक्षाओं के लिए हरे रंग का श्यामपट्ट अधिक उपयुक्त माना जाता है।
3. आलमारियाँ (Almirahs/Cabinets)
प्रत्येक कक्षा में एक या दो आलमारियाँ होनी चाहिए, जिनमें रजिस्टर, संदर्भ पुस्तकें, शिक्षण सामग्री तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ सुरक्षित रखी जा सकें।
4. पुस्तकालय (Library)
पुस्तकालय विद्यालय का हृदय कहलाता है। पुस्तकालय विद्यार्थियों को ज्ञान, सूचना एवं अध्ययन के अवसर प्रदान करता है।
कार्लाइल (Carlyle) के अनुसार, पुस्तकों का संकलन वर्तमान युग का वास्तविक विद्यालय है।
पुस्तकें हमारे जीवन की पथ-प्रदर्शक हैं। वे ज्ञान के भंडार के साथ-साथ मानव अनुभवों एवं विचारों का संग्रह भी होती हैं।
विद्यालय पुस्तकालय विद्यार्थियों में निम्नलिखित गुणों का विकास करता है—
- स्वाध्याय की आदत
- ज्ञान एवं सूचना प्राप्त करने की रुचि
- चिंतन एवं विश्लेषणात्मक क्षमता
- भाषा एवं अभिव्यक्ति कौशल
- रचनात्मकता एवं कल्पनाशीलता
5. विद्यालय समय-सारणी (School Timetable)
विद्यालय समय-सारणी वह योजना है, जिसके माध्यम से विभिन्न विषयों, कक्षाओं, शिक्षकों एवं शैक्षिक गतिविधियों के लिए समय का निर्धारण किया जाता है।
समय-सारणी विद्यालय की समस्त गतिविधियों को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने में सहायता करती है।
समय-सारणी का महत्व (Importance of Timetable)
- शिक्षण कार्य को व्यवस्थित बनाती है।
- विभिन्न विषयों एवं कक्षाओं के बीच समय का उचित वितरण करती है।
- शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के समय का सदुपयोग सुनिश्चित करती है।
- विद्यालय में अनुशासन एवं नियमितता बनाए रखती है।
- शैक्षिक गतिविधियों में समन्वय स्थापित करती है।
- विद्यालय के कार्यों में अनावश्यक अव्यवस्था को रोकती है।
विद्यालय समय-सारणी निर्माण के सिद्धांत (Principles of Timetable Construction)
1. कालांशों की अवधि (Duration of Periods)
कालांशों की अवधि निर्धारित करते समय विद्यार्थियों की आयु, शारीरिक एवं मानसिक अवस्था तथा विषय की प्रकृति को ध्यान में रखना चाहिए।
ग्रीष्मकाल में छोटे कालांश तथा छोटे विद्यालय दिवस अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।
2. कालांशों का क्रम (Sequence of Periods)
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा गया है कि द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ कालांशों में विद्यार्थियों की कार्यक्षमता सामान्यतः अधिक होती है।
इसलिए कठिन एवं महत्वपूर्ण विषयों को इन कालांशों में पढ़ाना अधिक उपयोगी हो सकता है।
3. विषयों का क्रम (Sequence of Subjects)
दो कठिन विषयों को एक के बाद एक नहीं रखना चाहिए। विषयों के क्रम में विविधता होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थियों में रुचि एवं ध्यान बना रहे।
4. सप्ताह के दिनों का ध्यान रखना (Weekly Distribution)
सोमवार का दिन सप्ताह के प्रारंभ में होने के कारण मानसिक रूप से तैयारी के लिए महत्वपूर्ण होता है। शनिवार को विद्यार्थी थकान अनुभव कर सकते हैं।
इसलिए सप्ताह के प्रथम एवं अंतिम दिनों में रोचक एवं गतिविधि-आधारित शिक्षण को प्राथमिकता दी जा सकती है।
5. पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ (Co-curricular Activities)
विद्यालय में शिक्षा का उद्देश्य केवल कक्षा-कक्ष में बैठकर ज्ञान प्राप्त करना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक विकास को सुनिश्चित करना भी है।
इसलिए समय-सारणी में खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रार्थना सभा, योग एवं अन्य पाठ्य-सहगामी गतिविधियों के लिए भी समय निर्धारित होना चाहिए।
विद्यालय समय-सारणी के प्रकार (Types of School Timetable)
- सामान्य समय-सारणी (General Timetable)
- शिक्षक समय-सारणी (Teacher’s Timetable)
- कक्षा समय-सारणी (Class Timetable)
- व्यक्तिगत समय-सारणी (Individual Timetable)
- प्रयोगशाला समय-सारणी (Laboratory Timetable)
- परीक्षा समय-सारणी (Examination Timetable)
विद्यालय में महत्वपूर्ण अभिलेखों का प्रबंधन (Management of School Records)
विद्यालय के प्रभावी प्रशासन एवं संचालन के लिए विभिन्न अभिलेखों (School Records) का व्यवस्थित रखरखाव आवश्यक है।
विद्यालय के अभिलेख न केवल प्रशासनिक कार्यों में सहायता करते हैं, बल्कि विद्यालय के इतिहास, प्रगति एवं उपलब्धियों का भी प्रमाण होते हैं।
1. विद्यालय कैलेंडर (School Calendar)
विद्यालय कैलेंडर में वर्षभर की गतिविधियों एवं कार्यक्रमों का विवरण होता है।
इसमें निम्नलिखित जानकारी सम्मिलित होती है—
- सामान्य एवं स्थानीय अवकाश
- विद्यालय का वार्षिक कार्यक्रम
- शैक्षिक भ्रमण
- परीक्षा एवं मूल्यांकन की तिथियाँ
- सांस्कृतिक एवं खेलकूद गतिविधियाँ
2. सेवा पुस्तिका (Service Book)
सेवा पुस्तिका शिक्षक एवं अन्य कर्मचारियों का महत्वपूर्ण अभिलेख है।
इसमें कर्मचारी की नियुक्ति, वेतन वृद्धि, स्थानांतरण, पदोन्नति, अवकाश तथा अन्य सेवा संबंधी विवरण दर्ज किए जाते हैं।
3. दर्शक पुस्तिका (Visitor’s Book)
इस पुस्तिका में विद्यालय में समय-समय पर आने वाले अतिथियों, निरीक्षण अधिकारियों एवं अन्य व्यक्तियों के विचार, सुझाव तथा टिप्पणियाँ दर्ज की जाती हैं।
4. कैश बुक (Cash Book)
कैश बुक विद्यालय का महत्वपूर्ण वित्तीय अभिलेख है।
इसमें विद्यालय की दैनिक आय एवं व्यय, विद्यार्थियों से प्राप्त शुल्क, अनुदान तथा अन्य वित्तीय लेन-देन का विवरण दर्ज किया जाता है।
5. अवकाश पंजिका (Leave Register)
इस पंजिका में विद्यालय के कर्मचारियों द्वारा लिए गए अवकाशों का विवरण दर्ज किया जाता है।
इसमें अवकाश की अवधि, प्रकार एवं कारण का उल्लेख किया जाता है।
6. प्रवेश पंजिका (Admission Register)
प्रवेश पंजिका में विद्यालय में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक विद्यार्थी का विवरण दर्ज किया जाता है।
इसमें विद्यार्थी का नाम, पिता का नाम, माता का नाम, जन्मतिथि, पता, प्रवेश तिथि एवं पूर्व विद्यालय का विवरण आदि सम्मिलित होते हैं।
7. छात्र उपस्थिति पंजिका (Student Attendance Register)
इस पंजिका में विद्यार्थियों की दैनिक उपस्थिति दर्ज की जाती है।
इसके आधार पर विद्यार्थियों की नियमितता, अनुपस्थिति एवं मासिक उपस्थिति का विवरण तैयार किया जाता है।
8. अध्यापक उपस्थिति पंजिका (Teacher Attendance Register)
इस पंजिका में शिक्षकों की उपस्थिति, अनुपस्थिति एवं अवकाश का विवरण दर्ज किया जाता है।
इसके आधार पर शिक्षकों की नियमितता एवं कार्य संबंधी अभिलेख तैयार किए जाते हैं।
9. अध्यापक दैनिक पुस्तिका (Teacher’s Diary)
इस पुस्तिका में शिक्षक अपनी शिक्षण योजना, शिक्षण विधियाँ, विद्यार्थियों के मूल्यांकन एवं प्रधानाध्यापक के निर्देशों का विवरण लिखते हैं।
10. लॉग बुक (Log Book)
लॉग बुक विद्यालय की महत्वपूर्ण घटनाओं एवं गतिविधियों का अभिलेख है।
इसमें नवीन कार्यों, विशेष कार्यक्रमों, निरीक्षण अधिकारियों के आगमन तथा विद्यालय की उपलब्धियों का विवरण दर्ज किया जाता है।
विद्यालय में छात्र अनुशासन (Student Discipline)
अनुशासन (Discipline) विद्यालय की शैक्षिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है।
‘अनुशासन’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द Discipulus से मानी जाती है, जिसका अर्थ है ‘सीखना’ (To Learn)।
अनुशासन की प्रमुख परिभाषाएँ
माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार: अनुशासन स्वैच्छिक एवं कुशलतापूर्वक किए गए सहयोगात्मक कार्यों का मूल्यांकन तथा सह-उत्पाद है।
प्लेटो (Plato) के अनुसार: बालकों को दंड की अपेक्षा खेल द्वारा नियंत्रित करना अधिक उचित है।
पेस्टालॉजी (Pestalozzi) के अनुसार: अनुशासन का आधार प्रेम है।
रायबर्न (Rayburn) के अनुसार: सच्चा अनुशासन नकारात्मक एवं दमनात्मक होने के स्थान पर सकारात्मक एवं रचनात्मक होना चाहिए।
छात्र अनुशासन का महत्व (Importance of Student Discipline)
- विद्यालय में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है।
- विद्यार्थियों में आत्मनियंत्रण एवं आत्मनिर्भरता विकसित करता है।
- सामाजिक व्यवहार एवं सहयोग की भावना विकसित करता है।
- शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाता है।
- विद्यार्थियों में उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यबोध विकसित करता है।
- नैतिक मूल्यों एवं व्यक्तित्व विकास को प्रोत्साहित करता है।
विद्यालय प्रशासन एवं प्रबंधन के प्रमुख सिद्धांत (Principles of School Administration and Management)
POCCC सिद्धांत
विद्यालय प्रबंधन की प्रक्रिया को POCCC के नाम से जाना जाता है।
POCCC का पूर्ण रूप है—
- P – Planning (योजना बनाना): विद्यालय के उद्देश्यों एवं कार्यों की पूर्व योजना बनाना।
- O – Organising (संगठन करना): उपलब्ध संसाधनों एवं कर्मचारियों को व्यवस्थित करना।
- C – Commanding (निर्देशन देना): कर्मचारियों को कार्य करने के लिए निर्देश एवं मार्गदर्शन प्रदान करना।
- C – Coordinating (समन्वय करना): विभिन्न विभागों एवं गतिविधियों में समन्वय स्थापित करना।
- C – Controlling (नियंत्रण करना): कार्यों की निगरानी, मूल्यांकन एवं आवश्यक सुधार करना।
यह सिद्धांत विद्यालय प्रशासन को व्यवस्थित, प्रभावी एवं उद्देश्यपूर्ण बनाने में सहायता करता है।
विद्यालय प्रबंधन से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (Important Facts)
- विद्यालय की प्रबंधकीय संरचना सामान्यतः पिरामिड के समान होती है, जिसमें सर्वोच्च स्थान पर प्रधानाचार्य होते हैं।
- प्रधानाचार्य अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के कार्यों का मार्गदर्शन एवं नियंत्रण करते हैं।
- विद्यालय समय-सारणी एक सुव्यवस्थित समय एवं कार्य प्रबंधन का साधन है।
- भारत में आधुनिक शैक्षिक प्रशासन एवं प्रबंधन के अध्ययन को 1953–54 के आसपास व्यवस्थित रूप से प्रोत्साहन मिला।
- शिक्षा आयोग (1964–66) ने जीविकोपार्जन को शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य माना।
- विद्यालय प्रबंधन में नेतृत्व (Leadership) एक महत्वपूर्ण तत्व है।
- जॉन ड्यूवी (John Dewey) के अनुसार, पाठशाला समाज का लघु रूप है।
- प्रभावी प्रबंधन में संगठन, नेतृत्व, समन्वय एवं नियंत्रण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
आधुनिक शैक्षिक प्रबंधन के छह प्रमुख तत्व (Six Elements of Educational Management)
आधुनिक शैक्षिक प्रबंधन में निम्नलिखित तत्वों को महत्वपूर्ण माना जाता है—
- Planning (योजना निर्माण)
- Organising (संगठन)
- Staffing (कर्मचारी व्यवस्था)
- Directing (निर्देशन)
- Coordinating (समन्वय)
- Controlling (नियंत्रण एवं मूल्यांकन)
ये सभी तत्व विद्यालय के उद्देश्यों की प्राप्ति, संसाधनों के उचित उपयोग तथा शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार के लिए आवश्यक हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
विद्यालय में मानवीय संसाधनों का प्रबंधन (Human Resource Management in School) शैक्षिक प्रशासन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। विद्यालय की सफलता उसके कर्मचारियों की योग्यता, कार्यक्षमता, प्रेरणा, सहयोग एवं नेतृत्व पर निर्भर करती है।
एक प्रभावी प्रधानाध्यापक वह होता है, जो मानवीय एवं भौतिक संसाधनों का उचित उपयोग करके विद्यालय में सकारात्मक वातावरण विकसित करता है तथा शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है।
इस प्रकार प्रभावी मानवीय संसाधन प्रबंधन विद्यालय की शैक्षिक गुणवत्ता, अनुशासन, कार्यक्षमता एवं विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का आधार है।