गुणसूत्र की संरचना, आकृति, रासायनिक संगठन  एवं प्रकार

गुणसूत्र (Chromosome), कोशिका के केन्द्रक (Nucleus) में सूक्ष्म सूत्र जैसा भाग है जो वंशागति के लिए आवश्यक है।

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गुणसूत्र की संरचना

इनकी संरचना में निम्न भाग दिखाई देते है-

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अर्धगुणसूत्र या क्रोमेटिड (Chromatid)

कोशिका विभाजन की मेटाफेज (Metaphase) में गुण सूत्र के दो लंबवत भाग एक ही गुणसूत्रबिंदु से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। इनको क्रोमेटिड कहा जाता है। ऐनाफेज अवस्था के दौरान गुणसूत्रबिंदु का विभाजन होने से यह दोनों क्रोमेटिड पृथक हो जाते हैं, और पुत्रीगुणसूत्र (Daughter Chromosome) बनाते हैं।

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क्रोमोनिमेटा (Chromonemata)

इंटरफ़ेज (Interphase) में गुण सूत्र अत्यधिक कुंडली अवस्था में दिखाई देता है, इन्हें क्रोमोनिमेटा (Chromonemata) या वर्ण-गुणसूत्र कहा जाता है।

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क्रोमोमियर (Chromomere)

क्रोमोनिमेटा पर बिंदु के जैसी अत्यधिक कुंडली (Coiled) संरचनाएं दिखाई देती है, जिन्हें क्रोमोमियर (Chromomere) कहा जाता है।

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गुणसूत्रबिंदु (Centromere)

क्रोमोसोम की लंबाई में एक स्थान पर यह थोड़ा संकरा होता है, इस भाग को प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) या गुणसूत्रबिंदु (Centromere)  कहते हैं।

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काइनेटोकोर (Kinetochore)

गुणसूत्रबिंदु पर पाई जाने वाली प्रोटीन काइनेटोकोर (Kinetochore) कहलाती है। कोशिका विभाजन के दौरान तर्कू तंतु (Spindal Fibers) काइनेटोकोर से ही जुड़ते हैं।

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द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction)

कुछ गुणसूत्रों में प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) के अलावा एक अन्य संकरा भाग भी पाया जाता है, जिसे द्वितीयक संकीर्णन कहते हैं।

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अनुषंघी सैटेलाइट क्रोमोसोम (Satellite Chromosome)

ऐसे गुण सूत्र जिनमें द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction) पाया जाता है, उनके द्वितीयक संकीर्णन के ऊपर की एक छोटी भुजा सेटेलाइट (Satellite) कहलाती है। और ये सैटेलाइट गुणसूत्र कहलाते हैं।

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टिलोमीयर (Telomere)

गुणसूत्रों का अंतिम छोर (End tip) टिलोमीयर कहलाता है।

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गुणसूत्र का रासायनिक संगठन

इनमें डीएनए तथा प्रोटीन पाए जाते हैं।

यह प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं-

  1. हिस्टोन प्रोटीन  (Histon Protein)
  2. नॉन हिस्टोन प्रोटीन (Non Histon Protein)

 

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हिस्टोन प्रोटीन

यह  क्षारीय प्रोटीन (Alkali Protein) होते हैं। इनमें लाइसिन और आर्जिनिन (Lysine and Arginine) अमीनो अम्ल की मात्रा अधिक होती है। यह पांच प्रकार के होते हैं-
जिनका नाम निम्न है

  • H1
  • H2A
  • H2B
  • H3
  • H4

इनमें से H2A, H2B H3, H4 के दो-दो इकाई जुड़कर हिस्टोन अष्टक (Histon Octamere) का निर्माण करते हैं। इनको कॉड कण (Core Partical) भी कहा जाता है।

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न्यूक्लियोसोम

हिस्टोन अष्टक के साथ डीएनए की लगभग दो कुंडली तथा H1 हिस्टोन जुड़कर  संरचना बनाती है, जिसे न्यूक्लियोसोम (Nucleosome) कहा जाता है।
लगभग 6 न्यूक्लियोसोम (Nucleosome) आपस में जुड़ कर सोलेनोइड (Solenoid) नामक संरचना का निर्माण करते हैं।

सोलेनोइड की अवधारणा आउडेट के द्वारा दी गई तथा न्यूक्लियोसोम प्रतिरूप कोर्नबर्ग तथा थॉमस के द्वारा दिया गया।

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गुणसूत्रों  की आकृति

गुणसूत्रबिन्दु की स्थिति और गुणसूत्रभुजा (Chromosomal arm)  की लंबाई की  के आधार पर, गुणसूत्रों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जाता है-

  1. अन्तकेन्द्रकी (Telocentric)
  2. अग्रबिंदु या उप-अन्तकेन्द्रकी (Acrocentric)
  3. उप-मध्यकेन्द्रकी (Submetacentric)
  4. मध्यकेन्द्रकी (Metacentric)
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अग्र केन्द्रकी गुणसूत्र (Telocentric)

टेलोसेंट्रिक गुणसूत्रों में,  गुणसूत्रबिन्दु (Centromere)  गुणसूत्र के अंतिम सिरे (टिप) पर स्थित होता है।

इस प्रकार के गुणसूत्र कोशिका विभाजन की एनाफेज (Anaphase) अवस्था में ’i’ आकार की संरचना के रूप में दिखाई देते हैं।
इन गुणसूत्रों में केवल एक गुणसूत्रभुजा (Chromosomal arm) होता है।

इस प्रकार के chromosome में बहुत दुर्लभ होते हैं और इन्हें केवल बहुत कम प्रजातियों में देखा गया है।

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अन्तकेन्द्रकी गुणसूत्र (Acrocentric)

गुणसूत्रबिन्दु (Centromere) क्रोमोसोम के एक छोर पर इस तरह से स्थित होते है कि इनकी एक बहुत ही छोटी भुजा (P arm) और एक असाधारण लंबी भुजा (Q arm) होती है।

कोशिका विभाजन की  मेटाफ़ेज़ अवस्था (Metaphase) में ये ‘J ‘आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं।

टिड्डियों के कुल Acrididae में ऐसे गुण सुत्रों को देखा गया जिससे इनका नाम Acrocentric क्रोमोसोम रखा गया है।

सभी एक्रोकेंट्रिक क्रोमोसोम SAT-गुणसुत्र होते है।

SAT-गुणसुत्र  ऐसे गुणसूत्र जिनमें प्राथमिक संकीर्णन के अलावा एक अन्य द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction) भी पाया जाता है जिससे गुणसूत्र के एक छोर पर एक घुंडी जैसी संरचना दिखती जिसे सेटेलाइट कहते है और ऐसे गुणसूत्र SAT-गुणसुत्र कहलाते है ।
मानव में, गुणसूत्र संख्या 13, 15, 21 और 22  ऐसे ही गुण सूत्र होते हैं।

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उप-मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र (Submetacentric)

सेंट्रोमियर क्रोमोसोम के केंद्र या मध्य से थोडा दूर हटके (away) स्थित होता है।

इसमें दो असमान भुजा (Chromosome arm) होती है एक भुजा छोटी और एक बड़ी भुजा होती है।

सबमेटासेंट्रिक गुणसूत्र कोशिका विभाजन के ऐनाफेज (Anaphase) अवस्था में L आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं।
मानव गुणसूत्रों के अधिकांश submetacentric chromosome होते हैं।

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मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र (Metacentric)

गुणसूत्रबिन्दु (centromere) क्रोमोसोम के बिल्कुल केंद्र में स्थित होता है। इस प्रकार गुणसूत्रों के दो बराबर आकार की भुजाएँ होती है।

मेटासेंट्रिक गुणसूत्र कोशिका विभाजन के एनाफेज (Anaphase) में V आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देंगे।

इन गुणसूत्रों को एक आदिम प्रकार (Primitive) का गुणसूत्र माना जाता है। जो प्रोकैरियोट में पाया जाया है तथा उभयचर में एवं मानव के गुणसूत्र संख्या 1 और 3 मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र होते हैं।

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गुणसूत्रों के प्रकार

गुणसूत्र चार प्रकार के होते हैं-

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अलिंग गुणसूत्र (Autosomal Chromosome)

यह लिंग से संबंधित लक्षणों को छोड़कर सभी प्रकार के कायिक लक्षणों (Somatic symptoms) का निर्धारण करते हैं। इनकी संख्या मानव में 44 होती है।

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लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosome)

यह लिंग का निर्धारण (Sex determination) करते है इनकी संख्या में दो होती है। पुरुष में XY तथा मादा में XX।

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सहायक गुणसूत्र (Acessory Chromosome)

यह गुणसूत्रों के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जिनमें गुणसूत्रबिंदु नहीं पाया जाता। यह अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) में भाग नहीं लेते। अनुवांशिक रूप से निष्क्रिय होते हैं। इनकी खोज विल्सन द्वारा की गई।

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विशालकाय गुणसूत्र (Giant  chromoses)

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पॉलीटीन गुणसूत्र (Polytene Chromosome)

इसकी खोज ई.जी. बालबियानी (E.G. balbiani) ने डायप्टेरा (diapteron) कीटों के लार्वा की लार ग्रंथि में की। पॉलीटीन गुणसूत्र कोल्लर (koller) द्वारा दिया गया।

इसमें कई क्रोमोनिमा (chromonema) होते हैं, इसलिए इसे पॉलीटीन गुणसूत्र कहा जाता है।

इनके कई क्रोमोनिमा क्रोमोमियर से जुड़े रहते हैं। प्रत्येक क्रोमोनिमा में पफ क्षेत्र और गैर-पफ (पफ विहीन) क्षेत्र (puffed region & non-puffed regions) होते हैं।

पफ क्षेत्र में बालबियानी छल्ले (Balabiani rings) होते हैं जो डीएनए, आरएनए और प्रोटीन से बने होते हैं।

गैर-पफ क्षेत्र छल्ले के होते हैं लेकिन वे बैंड (पट्टी) और इंटरबैंड से बने होते हैं।

ये क्रोमोसोम एंडोमाइटोसिस (endomostosi) द्वारा बनते हैं। ये कीटों के  लार्वा में कायान्तरण (मेटामॉर्फोसिस) को बढ़ावा देते हैं।

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लैंपब्रश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosomes)

यह लैम्प (Lamp) की सफाई करने वाले ब्रश की तरह दिखाई देता है। इसलिए इनको लैंप ब्रश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosome) नाम दिया गया।

इनकी खोज रुकर्ट ने की।

ये शार्क, उभयचर, सरीसृप और पक्षियों के प्राथमिक अण्डक (oocytes) में अर्द्धसूत्री विभाजन के प्रोफेज-I की डिप्लोटिन अवस्था में पाये जाते है।

वे अण्डों योक के संश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसमें एक मुख्य अक्ष होता है जिसमें डीएनए और प्रोटीन से बने दो क्रोमोनिमा (chromonema)  होते हैं।

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इन्हें भी पढ़े

  1. प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाएं (Cells of Immune system)
  2. एड्स तथा एचआईवी (AIDS and HIV)
  3. प्रतिरक्षी एंटीबॉडी की संरचना एवं कार्य (The structure and function of antibody)
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बाहरी कड़ियाँ

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