रक्त की संरचना एवं संघठन

structure and composition of blood in Hindi, रक्त की संरचना एवं संघठन

 

रक्त (Blood)

रक्त तरल संयोजी ऊत्तक (Fluid Connective Tissue) है। रक्त में बाह्य कोशिकीय तरल (ECM) तन्तुओं विहीन होते है। कोशिकाओं के बाहर तरल सामान्यतया बाह्य कोशिकीय तरल (Extra Cellular Matrix) कहलाता है।

रक्त जल की अपेक्षा भारी होता है। रक्त का pH 7.4 (आंशिक रूप से क्षारीय) होता है।

उच्चतर जन्तुओं की रक्त वाहिनियों में रक्त परिसंचरित होता है। लेकिन बाह्य कोशिकीय तरल जैसे सेरेब्रोस्पाइनल तथा लसिका रक्त वाहिनियों के बाहर होती है।

रक्त को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।

  • प्लाज्मा
  • रक्त कणिकाएं

प्लाज्मा (Plasma)

यह रक्त का द्रव भाग है। यह हल्का पीला लेकिन पारदर्शी तथा स्पष्ट द्रव्य है। प्लाज्मा का हल्का पीला रंग बिलिरूबिन (Bilirubin) के कारण होता है। जो एक पीत्त वर्णक (Yellow Pigement) है।

यह आंशिक रूप से क्षारीय निर्जीव अन्तः कोशिकीय पदार्थ है, जो रक्त का 55% भाग बनाती है।

प्लाज्मा में 90% जल तथा 10% कार्बनिक और अकार्बनिक यौगिक होते हैं।‌ कार्बनिक पदार्थ के रूप में प्लाज्मा प्रोटीन पाई जाती है।

प्लाज्मा प्रोटीन (Plasma Protein)

Plasma Protein ऊत्तक कोशिकाओं के लिए प्रोटीन के स्त्रोत के रूप में कार्य करते हैं। ऊत्तक कोशिकाएँ कोशिकीय प्रोटीन निर्माण के लिए प्लाज्मा प्रोटीन का उपभोग करती है।

प्लाज्मा प्रोटीन प्रबल अम्ल तथा क्षारों की उदासीनता द्वारा रक्त pH को भी बनाए रखती है। अतः ये अम्ल-क्षार बफर के रूप में कार्य करती है।

यह आंशिक रूप से क्षारीय निर्जीव अन्तः कोशिकीय पदार्थ है, जो रक्त का 55% भाग बनाती है।

प्लाज्मा प्रोटीनी में कमी रक्त से ऊत्तक में जल अत्यधिक आयतन की गति को बढ़ाती है। ऐसा प्रोटीन की कमी से पीड़ित व्यक्ति में तरल जमाव से हाथ व पैरों के सूजने से होता है।

प्लाज्मा में प्लाज्मा प्रोटीन के तीन प्रमुख वर्ग होते हैं-

  • सीरम एल्बुमिन
  • सीरम ग्लोब्युलिन
  • फाइब्रिनोजन।
एल्बुमिन (Albumin)

एल्बुलिन रक्त प्लाज्मा में परासरणी प्रभाव (Osmatic effect) द्वारा जल बनाए रखती हैं।

ग्लोब्युलिन (Globulin)

यह तीन प्रकार की होती है‌। जो α (Alpha) β (Beta) और γ (Gamma) ग्लोब्युलिन प्रोटीन इम्युनोग्लोब्युलिन कहलाती है।

α (Alpha) ग्लोब्युलिन – का परिवहन

β (Beta) ग्लोब्युलिन – का परिवहन

γ (Gamma) ग्लोब्युलिन -एन्टिबॉडी के रूप में कार्य करती है।

एल्बुमिन तथा ग्लोबुलिन अनेक पदार्थों को भी परिवहित करते हैं, जैसे थायरॉक्सिन।

अकार्बनिक पदार्थ (Inorganic Substances)

इसके रूप में प्लाज्मा में विभिन्न प्रकार के आयन पाए जाते हैं जैसे धनायन – H+ , Na+ , K+ , Ca2+ Mg2+ ऋणायन – Cl , HCO3 , PO42- , SO42-

रक्त कोशिकाएँ (Blood Cells)

इनको रक्त बिम्बाणु (Blood Corpuscles) भी कहते है। यह सामान्यतया रक्त आयतन का 45 प्रतिशत बनाता है।रक्त कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती है-

  • इरिथ्रोसाइट्स
  • ल्यूकोसाइट्स
  • थ्रोम्बोसाइट्स

लाल रक्त कणिकाएँ (RBC)

लाल रक्त कणिकाएँ (RBC) को इरिथ्रोसाइट्स (Erythrocytes) भी कहते है। इनका महत्वपूर्ण अभिलाक्षणिक लक्षण हीमोग्लोबिन की उपस्थिति है, जो ऑक्सीजन का वहन करने वाला श्वसन वर्णक (Respiratory Pigment) हैं।

इरिथ्रोसाइट्स की कुल संख्या प्रति माइक्रोलिटर रक्त में RBC की कुल मात्रा Total count of RBC कहलाती है।

लाल रक्त कणिकाएँ (RBC) की मात्रा वयस्क मनुष्य में 5 मिलियन तथा वयस्क महिला में 4.5 मिलियन होती है।

RBC की कुल मात्रा में कमी एनीमिया कहलाता है। RBC की कुल मात्रा में वृद्धि पोलिसायथेमिया कहलाती है।

एनीमिया फॉलिक अम्ल, विटामिन B12 तथा हीमोग्लोबिन की न्यूनता के कारण होता है।

जन्तुओं के विभिन्न वर्गों में इरिथ्रोसाइट्स का आकार व आकृति भिन्न-भिन्न होती है।

  • मछलियों, उभयचरों, सरीसृपों तथा पक्षियों में इरिथ्रोसाइट्स प्रायः केन्द्रक युक्त, अण्डाकार तथा द्विउत्तल होती है।
  • स्तनियों में ये केन्द्रक विहीन, उभयावतल तथा वलयाकार होती है।
  • केवल ऊँटों तथा लामा में अण्डाकार केन्द्रक युक्त लाल रक्त कणिकाएँ होती है।
  • स्तनियों की त्ठब् वलयाकार, द्विअवतल, अकेन्द्रकीय होती है, (केमेलिडी कुल के अतिरिक्त उदा.-ऊँट) जिसमें अकेन्द्रकीय तथा अण्डाकार त्ठब् होती है। सबसे बड़ी RBCs एम्फिबिया में होती है।
  • स्तनियों में सबसे छोटी RBC मस्क हिरण (ट्रेगुलस जेवेनिकस) (1.5 µm) में पाई जाती है।
  • स्तनियों में सबसे बड़ी RBC हाथी (9.4 µm) में पाई जाती है।

मानव इरिथ्रोसाइट्स व्यास में 7-8 µm तथा मोटाई में 2 µm होती है। पुरानी तथा क्षतिग्रस्त इरिथ्रोसाइट्स मेक्रोफेज द्वारा फेगोसाइटोसिस प्रकिया द्वारा नष्ट होती है।

यदि रक्त का नमूना पौटेशियम या सोडियम ऑक्जेलेट के योजन द्वारा नोन-कोगुलेबल तथा फिर तीव्र गति पर सेन्ट्रिफ्युज्ड किया जाता है, तो सेन्ट्रिफ्युगल बल इरिथ्रोसाइट्स को नलिका के तल में तलछट करता है।

RBC का कब्रिस्तान प्लीहा (Graveyard of RBC) कहते है।

लाल रक्त कणिकाओं का जीवनकाल (Life Span of RBC)
  • मनुष्य की RBC का जीवन काल – 120 दिन
  • मेंढ़क की RBC का जीवन काल – 100 दिन
  • खरहे की RBC का जीवन काल – 80 दिन

रेडियोसक्रिय क्रोमियम विधि Cr51 RBC के जीवन काल के मत के लिए उपयोगी है।

RBC की गणना
  • भ्रूण में 8.5 मिलियन / mm3
  • मनुष्य में 5.5-5 मिलियन / mm3
  • महिला में 4.5 मिलियन / mm3
  • Red Blood Cells का प्रतिदिन अपघटन त- 1%
ESR (इरिथ्रोसाइट तलछटन दर)

यह विनट्रोब विधि द्वारा मापा जाता है। यह RBC के जमने की दर है। यह वेस्टरगन की विधि द्वारा भी निर्धारित होता है। ESR विभिन्न रोगों के निदान में उपयोगी है, जैसे ट्युबरकुलोसिस। मनुष्य में ESR 0-5 mm/hour तथा महिला में 0-7 mm/hour होती है।

हीमोसाइटोमीटर (Haemocytometer)

यह RBC तथा WBC दोनों की संख्या गिनते के लिए उपकरण है।

रोलेक्स (Rolex)

विश्राम तथा धीमे रक्त प्रवाह में RBC समूहित होकर रोलेक्स बनाती है। फाइब्रिनोजन रोलेक्स निर्माण में सहायक है।

अस्थि मज्जा (Bone Marrow)

यह RBC के निर्माण के लिए मुख्य स्थल है। जन्म के समय अस्थि मज्जा का आयतन 70 उसण् होता है। वयस्क में अस्थि मज्जा का आयतन 4ए000 उस होता है।

हीमोग्लोबिन (Hemoglobin)

यह शोषण वर्णक (Respiratory Pigment) है, जिसके कारण आरबीसी का रंग लाल होता है।

हीमोग्लोबिन का वर्णक भाग (पोरफायरिन) पीले वर्णक बिलिरूबिन को उपापचयित करता है, जो पीत्त में उत्सर्जित होता है।

Hemoglobin की सामान्य परास 
गर्भस्थ शिशू        16.5  ± 3.0 g/dl 
3 महीने के बच्चे        11.0 ± 1.5 g/dl 
3.6 महीने बच्चे         12.0 ± 1.0 g/dl
10.12 वर्षीय बच्चे      13.0 ± 1.5 g/dl 
मनुष्य      15.5 ± 2.5 g/dl 
महिला       14.0 ± 2.5 g/dl

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हीमोग्लोबिन की संरचना (Structure of Hemoglobin)

हीमोग्लोबिन के प्रत्येक अणु में हीम के 4 अणु तथा ग्लोबिन का 1 अणु होता है। हीम 5% तथा ग्लोबिन 95% होता है। ग्लोबिन 4 पोलिपेप्टाइड श्रृँखलाओं का बना होता है।

ये सहसंयोजक बंध द्वारा जुड़े होते हैं।

हीम प्रोटोपोरफायरिन यौगिक है, तथा जिसमें 4 पाइरोल समूह एक साथ जुड़े होते हैं, जो वलय संरचना बनाते हैं। Hb में Fe फेरस (Fe++) में होता है।

ग्लोबिन 2 α (Alpha) तथा β (Beta) पोलिपेप्टाइड श्रृँखलाएँ होती है।

श्वेत रक्त कणिकाएँ / ल्यूकोसाइट्स (Leucocytes)

ल्यूकोसाइट्स (श्वेत रक्त कणिकाएँ या WBC) में हीमोग्लोबिन अनुपस्थित होता है, तथा रंगहीन होती है ल्युकोसाइट्स केन्द्रक युक्त रक्त कोशिकाएँ है।

प्रति माइक्रोलिटर रक्त में ल्यूकोसाइट्स की संख्या WBC की कुल संख्या कहलाती है। यह 6000-8000 / mm3 होती है। यह गम्भीर संक्रमण में (उदा.-न्यूमोनिया), जलन (उदा.-एपेन्डिसिटिज) तथा मेलिग्नेन्सीज (उदा.-ल्यूकेमिया) में असामान्य रूप से बढ़ती है।

कुछ परिस्थितियों जैसे फॉलिक अम्ल की न्यूनता में WBC की संख्या घटती है। अनेक रोगों में WBC की कुल गणना का निदानात्मक गुण होता है।

प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाएं structure and composition of blood in Hindi, रक्त की संरचना एवं संघठन

इनके दो प्रमुख वर्ग होते हैं-

  • ग्रेन्युलोसाइट्स (Granulocytes) (कोशिकाद्रव्यीक कण)
  • एग्रेन्युलोसाइट्स (Agranulocytes) (कणिकाओं रहित)।

ग्रेन्युलोसाइट्स (Granulocytes)

यह तीन प्रकार के होते हैं। प्रत्येक पालित केन्द्रक युक्त होते हैं –

  1. न्युट्रोफिल्स (Neutrophils)
  2. इयोसिनोफिल (Eosinophils)
  3. बेसोफिल्स (Basophils)
न्यूट्रोफिल्स (Neutrophil)

ये संख्या में अधिकतम यानि कुल डब्ल्युबीसी का 62% होते हैं, तथा अम्लीय व क्षारीय रंजकों (Dyes) के साथ समान रूप से अभिरंजित (Stain) होते हैं। इनमें अनेक पालित केन्द्रक (Multilobed Nucleus), कोशिकाद्रव्य में अनेक कणिकाएँ (Granules) होते हैं, जो फेगोसाइटोसिस में सहायक है।

यह फेगोसाइटोसिस कोशिकाएं (Phagocytosis) होती है, अर्थात शरीर में प्रवेश करने वाले रोगाणुओं (Phathogens) को भक्षण (eat) करके नष्ट कर देती है

इयोसिनोफिल (Eosinophiil)

यह कुल डब्ल्यूबीसी का 2.5% होती है। इनमें द्विपालित केन्द्रक (Bilobed Nucleus) होता है, जो अम्लीय अभिरंजक (Dyes) के साथ अभिरंजित (Stain) होते हैं।

इनकी संख्या एलर्जिक अभिक्रियाओं के दौरान बढ़ती है जिसे इयोसिनोफिलिया कहते है। ये एलर्जी प्रतिक्रिया को कम करती है।

बेसोफिल (Basophil)

ये क्षारीय अभिरंजक (Dyes) से अभिरंजित (Stain) होते हैं। इनका केन्द्रक S आकृति का होता है। यह कुल डब्ल्यूबीसी का 0.5% होती है।

कोशिकाद्रव्य में कणिकाएँ कम होती है। बेसोफिल रक्त में हीपेरिन तथा हिस्टामिन स्त्रावित करती है, तथा मास्ट कोशिकाओं समान कार्य करती है। जो एलर्जी का कारण बनते हैं।

एग्रेन्युलोसाइट्स (Agranulocytes)

के दो प्रकार होते हैं

  • लिम्फोसाइट्स
  • मोनोसाइट्स
मोनोसाइट्स (Monocytes)

मोनोसाइट्स में वृक्क आकृति का बड़ा केन्द्रक होता है। न्यूट्रोफिल्स तथा मोनोसाइट्स फेगोसाइटोसिस द्वारा सूक्ष्मजीवों के विरूद्ध शरीर की सुरक्षा करते हैं। यह कुल डब्ल्यूबीसी का 5% होती है।

Monocytes रक्त से निकलकर संयोजी ऊतकों में प्रवेश करके मैक्रोफेज कोशिकाओं का निर्माण करती है।

लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes)

इनमें बड़ा तथा गोलाकार केन्द्रक होता है। कोशिकाद्रव्य पतली परिधीय फिल्म है। इनमें स्तम्भ कोशिकाएँ इनकी अस्थि मज्जा में होती है, तथा अस्थि मज्जा या थाइमस में विभेदित होती है। लिम्फोसाइट्स सूक्ष्मजीवों तथा उनके विष को नष्ट करने के लिए रक्त में एन्टीबॉडीज स्त्रावित करते हैं। यह कुल डब्ल्यूबीसी का 30% (दुसरी सबसे अधिकतम)  होती है। लिम्फोसाइट्स तीन प्रकार की होती है-

  1. T-लिम्फोसाइट्स
  2. B-लिम्फोसाइट्स
  3. NK- लिम्फोसाइट्स

  लिम्फोसाइट्स प्रतिजन के विरूद्ध प्रतिरोधी करती है, तथा ये अस्थि मज्जा में परिपक्व होती है।

डायपीडेसिस (Diapedesis)

वह प्रक्रिया जिसके द्वारा मोनोसाइट्स तथा न्यूट्रोफिल्स पतली केशिका भित्ति द्वारा बाहर निकलते हैं, डायपीडेसिस कहलाती है। structure and composition of blood in hindi, रक्त की संरचना एवं संघठन

 

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