पश्च अनुलेखन रूपान्तरण – आच्छादन, पुच्छन और संबंधन

पश्च अनुलेखन रूपान्तरण (Post-Transcription Modification)


पश्च अनुलेखन रूपान्तरण (Post-Transcription Modification)


Prokaryote में,अनुलेखन (Transcription) और अनुवादन (Translation) की प्रकिया दोनों एक ही समय में पूरी होती हैं। अनुलेखन (Transcription) होने से पहले ही अनुवादन (Translation) प्रारंभ हो जाता है। यूकेरियोट्स में, अनुवादन (Translation) प्रारंभ होने से पहले प्राथमिक आरएनए / पूर्व RNA (Pre-RNA) को संशोधित किया जाता है। इस चरण को RNA प्रसंस्करण (RNA processing) या अनुलेखन (Transcription) संशोधन या पश्च अनुलेखन रूपान्तरण (Post-Transcription Modification) कहा जाता है। RNA को केन्द्रक छिद्रों के माध्यम से साइटोप्लाज्म में आना होता है इसलिए RNA को RNAase से सुरक्षा के लिए संशोधित किया जाता है। सभी यूकेरियोटिक mRNA तथा बैक्टीरिया और यूकेरियोट दोनों के tRNA का प्रसंस्करण (Processing) होता है।

 

एक यूकेरियोटिक जीन में कोडिंग क्षेत्रों के साथ-साथ कई गैर-कोडिंग क्षेत्र भी पाये जाते है। कोडिंग क्षेत्रों को एक्सॉन या व्यक्तेक (Exon) तथा गैर-कोडिंग क्षेत्र को इंट्रॉन या अव्यक्तेक (Intron) कहते है। एक्सॉन के द्वारा प्रोटीन का कूटलेखन (Code) होता है, जबकि इंट्रॉन के द्वारा प्रोटीन का कूटलेखन(Code) नहीं होता। जब एक mRNA निर्माण होता है, तो उसमे इंट्रॉन तथा एक्सॉन दोनों ही पाए जाते है जिसे hnRNA (Heteronuclear RNA) कहते है। इस hnRNA का संशोधन के पश्चात एक mature mRNA का निर्माण होता है RNA संशोधन की प्रकिया निम्न चरणों में होती है-

(1) 5’ सिरे पर आच्छादन (Addition of a Cap on the 5’ end)

(2) 3’ सिरे पर पुच्छन (Addition of a Poly-A tail on the 3’ end)

(3) संबंधन (Splicing)

 

 

 


आच्छादन (5’ Cappping) –


mRNA अत्यंत अस्थायी होता है। राइबोन्यूक्लिऐज एंजाइम (RNAase) से सुरक्षा के लिए इसके सिरों को सुरक्षित करना आवश्यक होता है इसके लिए guanyl transferase एंजाइम का उपयोग किया जाता है। अनुलेखन (Transcription) या ट्रांसक्रिप्शन (Transcroption) शुरू होने के बाद जैसे ही 20-30 न्यूक्लियोटाइड्स का गठन होता आच्छादन (5’ Cappping) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। आच्छादन (5’ Cappping) प्रक्रिया में,संशोधित ग्वानिन guanine triphosphate (GTP जिसमे एक मिथाइल समूह जुड़ा रहता 7-methyl G) को mRNA के 5’ सिरे पर जोड़ा जाता है।


पुच्छन (3’ Poly A tail):-


यूकेरियोटिक mRNA में 80 से लेकर 250 एडीनोसिन युक्त श्रृंखला को 3’ सिरे पर जोड़ा जाता है जिसे पाली (A) पूंछ कहते है यहाँ A का अर्थ एडीनोसिन है mRNA की पुच्छन (3’ Poly A tail) प्रक्रिया निम्न घटनाओं में सहायता होती है –

1) यह केन्द्रक से परिपक्व mRNA को निर्यात (Export) करने में सहायता करता है।

2) यह mRNA की स्थायित्व (Stability) को बढ़ाता है।

3) यह अनुवादन (Translation) (Translation) के प्रारम्भ के समय अनुवादन (Translation)कारी कारकों (translational factors) के बंधन के लिए पहचान संकेत (recognition signa) के रूप में कार्य करता है।


संबंधन (Splicing):-


इंट्रॉन नॉनकोडिंग अनुक्रम (noncoding nucleotide sequence) है जो जीन में पायी जाती लेकिन प्रोटीन का कूटलेखन (Code) नहीँ करती इंट्रॉन चार प्रकार समूह के होते हैं:

  • समूह I (Self-splicing Introns): –

इनका संबंधन (Splicing) स्वतः होता है। इनके  संबंधन (Splicing) के लिए एंजाइम की आवश्यकता नहीं होती।

  • समूह II (Self-splicing Introns): –

इनका संबंधन (Splicing) भी स्वतः होता है संबंधन (Splicing) के लिए एंजाइम की आवश्यकता नहीं होती।

  • स्पलाईसीओसॉमल इंट्रॉन्स (Spliceosomal introns): –

इनका संबंधन (Splicing) स्वतः नहीं होता हैं। संबंधन (Splicing) के लिए एंजाइम की आवश्यकता होती।

  • इंट्रॉन

जिनके संबंधन (Splicing) के लिए एटीपी की आवश्यकता होती है।

 


समूह I और समूह II के संबंधन की क्रियाविधि (Mechanism of Splicing of Group-I and Group-II):-


समूह I और समूह II दोनों के संबंधन (Splicing) की प्रक्रिया समान चरणों में संपन्न होती है। इनमें संबंधन (Splicing) के लिए दो ट्रांस-एस्टीरिकरण अभिक्रियाए (Trans-esterificastion Reactions) होती है। जिसमें एक राइबोज शर्करा का 2 ‘या 3’ हाइड्रॉक्सिल समूह एक अन्य राइबोन्यूक्लिओटाइड के फॉस्फोरस पर एक न्युक्लेओफ़िलिक प्रहार (Nucleophilic Attack) करता है, जिससे स्वतंत्र हुए राइबोन्यूक्लिओटाइड का हाइड्रॉक्सिल समूह प्रथम न्युक्लेओफ़िलिक प्रहार (Nucleophilic Attack) करने वाले राइबोन्यूक्लिओटाइड के फॉस्फोरस पर एक न्युक्लेओफ़िलिक प्रहार (Nucleophilic Attack) करता है। जिससे Intron उन दोनों राइबोन्यूक्लिओटाइड के मध्य से अलग हो जाता है, और उन दोनों राइबोन्यूक्लिओटाइड के मध्य में एक फॉस्फोडाइस्टर बंध (Phosphodiester Bond) बन जाता है। जैसा की नीचे चित्र में दिखाया गया है।

     

समूह I तथा समूह II में उपयोग की ये जाने वाले न्युक्लेओफ़िलिक प्रहार में भिन्नता होती है। समूह I में ग्वानिन के 3’ हाइड्रॉक्सिल समूह का उपयोग किया जाता है। और समूह II में एडीनिन के 2’ हाइड्रॉक्सिल समूह का उपयोग किया जाता है।


स्पलाईसीओसॉमल इंट्रॉन्स के संबंधन की क्रियाविधि (Mechanism of Splicing of Spliceosomal introns):-


स्पलाईसीओसॉमल इंट्रॉन्स Spliceosomal introns अपना स्वतः संबंधन (Splicing) नहीं कर सकते। इनमें संबंधन (Splicing) के लिए एंजाइम की आवश्यकता होती है, जिनको Spliceosome कहते है Spliceosome एक RNA-प्रोटीन सम्मिश्र है, जिसमें snRNP (small nuclear ribonucleoprotein) पाये जाते है। युकेरियोट में पाँच प्रकार के snRNP पाये है, जो U1, U2, U4, U5, U6 है।


t-RNA तथा r-RNA भी संबंधन (Splicing) की प्रक्रिया से गुजरते है।  यानी इनका भी पश्च अनुलेखन रूपान्तरण (Post-Transcription Modification)होता है।


पश्च अनुलेखन रूपान्तरण (Post-Transcription Modification) पश्च अनुलेखन रूपान्तरण (Post-Transcription Modification)


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2 Comments
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  1. Reply
    अनुलेखन की क्रियाविधी (Transcription in Hindi) | Aliscience May 3, 2020 at 1:31 pm

    […] पश्च अनुलेखन रूपान्तरण (Post-Transcription Modification) […]

  2. Reply
    एंजाइम एवं एंजाइमों का वर्गीकरण (Enzymes and Classifications of Enzymes) | Aliscience May 15, 2020 at 2:26 pm

    […] (Ribozyme) नामक Enzyme में RNA पाया जाता है। जो RNA संबंधन (Splicing) में सहायता करता है। इसी तरह ऐबजाइम (Abzyme […]

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