राजस्थान के लोक देवता

राजस्थान के लोक देवता (Rajasthan Ke Lok Devta)

रामदेव जी

जन्म व जन्म स्थान

ये कृष्ण के अवतार माने जाते है। इनका जन्म भाद्रशुक्ल द्वितीया (बाबेरी बीज) को उपडुकासमेर गाँव, शिव तहसील (बाड़मेर) में 1352 ईस्वी में हुआ। 1385 ईस्वी भाद्र शुक्ल एकादशी को रामसरोवर (रुणेचा) में समाधि ली।

परिवार

ये तवंर वंशीय राजपूत थे। इनके पिता का नाम अजमल जी, माता का नाम मैणादे तथा गुरु का नाम बालनाथ था। इनका विवाह अमरकोट (पाकिस्तान) के राजा दलजी सोदा की अपंग पुत्री निहाल दे/ नैतल दे से हुआ।

प्रतिक चिन्ह तथा लोकगीत

रामदेव जी का प्रतीक चिन्ह “पगल्ये” कहलाते है। इनके लोकगाथा गीत ब्यावले कहलाते हैं। रामदेव जी का गीत सबसे लम्बा लोक गीत है।

रामदेवजी की ध्वजा, नेजा कहलाती हैं। नेजा पांच रंगों का होता हैं। राम देव जी लोक देवता के साथ कवि भी थे। रामदेव जी की रचना “चैबीस बाणिया” कहलाती है। इनके मेघवाल जाति के भक्त “रिखिया” कहलाते हैं।

प्रमुख स्थल

इनका प्रमुख स्थल रामदेवरा (रूणेचा), पोकरण तहसील (जैसलमेर) में है। इनके अन्य प्रमुख स्थान छोटा रामदेवरा (गुजरात), सुरताखेड़ा (चित्तोडगढ), मसुरिया पहाड़ी (जोधपुर) व बिराठिया (अजमेर) है। इनके यात्री ‘जातरू’ कहलाते है।

मेला

रामदेव जी का मेला भाद्र शुक्ल द्वितीया से भाद्र शुक्ल एकादशी तक रामदेवरा (रूणेचा) में भरता है। मेले का प्रमुख आकर्षण तेरहताली नृत्य होता हैं।

तेरहताली नृत्य व्यावसासिक श्रेणी का नृत्य है। जो कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है। उदयपुर की मांगी बाई तेरहताली नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यागना है। इनकी फड़ का वाचन मेघवाल जाति या कामड़ पथ के लोग करते है।

मेले में रात्रि जागरण को जम्मा जागरण कहते है। रामदेवजी को कपड़े का घोड़ा चढाया जाता है।

उपनाम

रामदेव जी हिन्दू तथा मुसलमान दोनों में ही समान रूप से लोकप्रिय है। मुस्लिम इन्हे रामसापीर या पीरों का पीर कहते है। इनको रुणेचा रा धनी भी कहते है।

मुसलिम को पुनः हिन्दू बनाने के लिए रामदेवजी  द्वारा “परावर्तन” अभियान चलाया था। इन्होनें सातलमेर में भैरव नाम के राक्षस को मारा।

अन्य

रामदेव जी के घोडे़ का नाम लीला था।  इन्होनें मेघवाल जाति की “डाली बाई” को अपनी बहन बनाया। इनके शिष्य हरजी तथा दलिया बाई थे।


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गोगा जी

जन्म व जन्म स्थान

इनका जन्म चुरू की राजगढ़ तहसील के ददरेवा (जेवरगाँव) गाँव में हुआ। इनकी समाधि – गोगामेड़ी, नोहर तहसील (हनुमानगढ) में है

परिवार

ये चौहान वंश के थे। इनके पिता का नाम जैवर सिंह, माता का नाम बाछल, पत्नी का केमल दे तथा गुरु का नाम गोरखनाथ था।

प्रतिक चिन्ह तथा लोकगीत

इनका प्रतिक चिन्ह भाला लिए हुए अश्वारोही है। मुस्लिम पुजारी चायल जाति के होते है। इनके लोकगाथा गीतों में डेरू नामक वाद्य यंत्र बजाया जाता है।

प्रमुख स्थल

इनका प्रमुख स्थल शीशमेडी (ददेरवा, चुरू) तथा धुरमेडी (गोगामेडी, नोहर, हनुमानगढ़), गोगाजी की ओल्डी सांचैर (जालौर) है। इनके थान खेजड़ी वृक्ष के नीचे होते है।

धुरमेडी (गोगामेडी) का निर्माण “फिरोज शाह तुगलक” ने करवाया। जिसके द्वार पर “बिस्मिल्लाह” अंकित है। तथा इसका पुनः निर्माण महाराजा गंगा सिंह नें कारवाया।

मेला

मेला भाद्र कृष्ण नवमी (गोगा नवमी) को भरता है। इस मेले में राज्य स्तरीय पशु मेला भी आयोजित होता है। जो राज्य का सबसे लम्बी अवधि तक चलने वाला पशु मेला है। मेले में बैल की हरियाणवी नस्ल का व्यापार होता है।

उपनाम

गोगा जी को सांपों के देवता तथा मुस्लिम जाहरपीर (यह नाम महमूद गजनवी ने दिया) या जीवित पीर कहते है। गोगा जी ने महमूद गजनवी से युद्ध लडा था।

अन्य

इनकी घोड़ी का नीला/  गोगा बप्पा है। साँप से बचने के लिए खेत में बुआई करने से पहले किसान गोगा जी के नाम से गोगाराखड़ी “हल” तथा “हाली” दोनों को बांधते है। उतर प्रदेश के इनके भक्त पुरबिये कहलाते है।

 

केसर कुवंर जी

ये गोगा जी के पुत्र थे कुवंर जी के थान पर सफेद ध्वजा फहराते है।

 

पाबूजी

जन्म व जन्म स्थान

इनका जन्म 1239 ई में जोधपुर के फलौदी तहसील के कोलुमंड गाँव में हुआ।

परिवार

ये राठौड़ वंश के थे। इनके पिता का नाम धांधल, माता का नाम कमला दे था। इनका विवाह अमरकोट के सूरजमल सोडा की पुत्री फूलमदे/ सुप्यार दे से हुआ।

प्रतिक चिन्ह तथा लोकगीत

प्रतिक चिन्ह भाला व बायीं और झुकी हुई पगड़ी। इनके लोकगीत पवाडे़ कहलाते है। जिसके गायन में माठ वाद्य का उपयोग होता है। पाबूजी की फड़ राज्य की सर्वाधिक लोकप्रिय फड़ है। जो “रावणहत्था” वाद्य यंत्र पर नायक व रेबारी जाति गाये जातेहै।

प्रमुख स्थल

कोलुमंड गाँव (जन्म स्थान) तथा जायल (नागौर) जहाँ पाबूजी देवल चारणी की गायों को अपने बहनोई जिन्दराव खींचीं से छुड़ाते हुए शहीद हुए।

मेला

पाबूजी का मेला चैत्र अमावस्या को कोलू गाँव में भरता है।

उपनाम

पाबूजी को ऊंटों के देवता, प्लेग रक्षक देवता, राइका/रेबारी जाति के आराध्य देव, मेहर मुसलमान के पीर आदि माना जाता है।

अन्य

आंशिया मोड़जी ने “पाबु प्रकाश” में पाबु जी की जीवनी की रचना की। इनकी घोडी का नाम केसर कालमी है। मारवाड़ क्षेत्र में सर्वप्रथम ऊंट लाने का श्रेय पाबूजी को है।


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रूपनाथ जी

इनको झरडा जी भी कहते है। ये पाबूजी जी के बड़े भाई बुढो जी के पुत्र थे इन्होंने जिन्दराव खींचीं को मारकर अपने चाचा तथा पिता की हत्या का बदला लिया इनको हिमाचल प्रदेश में बालकनाथ कहा जाता है।

इनका प्रमुख केंद्र कोलुमंड गाँव (जोधपुर) तथा सिमभुदडा (बीकानेर) है।

तेजा जी

जन्म व जन्म स्थान

इन्हें जाटों का अराध्य देव कहते है। इनका जन्म माघ शुक्ला चतुर्दशी वि.स. 1130 को खरनाल (नागौर) के जाट परिवार में हुआ।

परिवार

इनके पिता का नाम तहड़ जी तथा माता का नाम रामकुंवर था। इनका विवाह पनेर नरेश रामचन्‍द की पुत्री पैमल दे से हुआ था।

प्रतिक चिन्ह तथा लोकगीत

इनका प्रतीक चिन्ह हाथ में तलवार लिए अश्वारोही है। इनका कार्यक्षेत्र बांसी दुगारी (बूंदी) रहा है। किसान बुवाई के समय तेजा जी के गीत गाते है।

प्रमुख स्थल

ब्यावर (अजमेर), सैन्दरिया (अजमेर), भावन्ता गाँव (अजमेर), सुरसरा (अजमेर) तथा परबतसर (नागौर)।

सैदरिया स्थल पर तेजाजी का नाग ने डसा था। लाछां गुजरी की गायों को मेर के मीणाओं से छुडाने के लिए संघर्ष किया व वीर गति को प्राप्त हुए। सुरसरा (किशनगढ़, अजमेर) में तेजाजी वीर गति को प्राप्त हुए।

उपनाम

इनको कृषि कार्यो का उपकारक देवता, गायों का मुक्ति दाता, काला व बाला का देवता, सहरिया जाति के आदि देव कहते है। अजमेर में इनको धोलियावीर के नाम से जानते है।

मेला

इनका मेला परबतसर (नागौर) में ” भाद्र शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) ” को इनका मेला आयोजित होता है। इस मेले में वीरतेजाजी पशु मेला आयोजित होता है। इस मेले से राज्य सरकार को सर्वाधिक आय प्राप्त होती है।

अन्य

इनके पुजारी घोडला कहलाते है। इनकी घोडी का नाम लीलण (सिंणगारी) था। केम्ब्रिज विश्वविद्यालय (UK) में तेजा जी के जीवनी का प्रदर्शन हुआ। इन पर डाक टिकेट भी जारी किए गये।

 

 

देवनारायण जी

जन्म व जन्म स्थान

ये विष्णु का अवतार माने जाते है। इनका जन्म मालासेरी डूंगरी, आशीन्द (भीलवाडा) में हुआ।

परिवार

इनका वास्तविक नाम उदयसिंह था। इनके पिताजी का नाम संवाई भोज एवं माता का नाम सेडू खटाणी/ साढूमाता था। मध्य प्रदेश के धार के शासक राजा जयसिंह की पुत्री पीपलदे से इनका विवाह हुआ।

प्रतिक चिन्ह तथा लोकगीत

देवनारायणजी की फड राज्य की सबसे लम्बी फड़ है। फड़ वाचन गुर्जर जाति के भोपों के द्वारा “जन्तर” वाद्य यंत्र  पर किया जाता है। भारत सरकार के द्वारा इनकी फड़ का 5 रु का टिकट भी जारी किया गया। इसलिए ये सबसे छोटी फड भी है।

प्रमुख स्थल

देह्माली (पुष्कर), सवाई भोज मंदिर (आशीन्द ) भीलवाडा तथा देव धाम जोधपुरिया (टोंक) इस स्थान पर सर्वप्रथम देवनारायणजी ने अपने शिष्यों को उपदेश दिया था।

चित्तोडगढ़ में देवनारायणजी का मंदिर राणा सांगा ने करवाया।

मेला

देवनारायण जी का मेला भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को भरता हैं।

उपनाम

गुर्जर जाति के आराध्य देव

अन्य

देवनारायण जी के घोडे़ का नाम लीलाधर था। देवनारायण जी के मंदिरों में एक ईंट की पूजा होती है।


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हडबू/हरभू जी

जन्म व जन्म स्थान

इनका जन्म नागौर के भूण्डोल/भूण्डेल गाँव में सांखला राजपूत परिवार में हुआ।

परिवार

ये रामदेवी जी के मौसेरे भाई थे। बालीनाथ जी/ भोलानाथ जी इनके गुरु थे।

हरभू जी शकुन शास्त्र के ज्ञाता थे। ये मारवाड़ के राव जोधा के समकालीन थे।

मण्डोर को मुक्त कराने के लिए हडबू जी ने राव जोधा को कटार भेट की थी। युद्ध में सफल होने पर राव जोधा ने वेंगटी गाँव हरभू जी को भेंट में दिया।

ये सांखला राजपूतों के अराध्य देव है। इनका मंदिर जोधपुर के बेंगटी गाँव (फलौदी) में है।

हरभू जी के मंदिर में इनकी गाड़ी की पूजा होती है। इनका वाहन सियार है।

 

मल्ली नाथ जी

जन्म व जन्म स्थान

इनका जन्म तिलवाडा (बाडमेर) में हुआ।

परिवार

पिता का नाम रावल सलखा/ तिडा जी, माता का नाम जाणीदे था। गुरु का नाम उगम सी भाटी था।

मेला

इनका मेला चेत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक लूणी नदी के किनारे तिलवाड़ा (बाड़मेर) नामक स्थान पर भरता हैं।

यह मेला मल्लीनाथजी के राज्याभिषेक के अवसर से वर्तमान तक आयोजित हो रहा हैं।

इस मेले के साथ-साथ पशु मेला भी आयोजित होता है। इस मेले में थारपारकर व कांकरेज नस्ल की गाय का व्यापार होता है।

अन्य

बाड़मेर का गुड़ामलानी का नामकरण मल्लीनाथजी के नाम पर ही हुआ हैं।

इनका कथन -“ईश्वर एक है तथा ईश्वर का नाम के स्मरण से ही दुखों का निवारण हो सकता है।”

 

तल्लीनाथ जी

इनका वास्तविक नाम गागदेव राठौड़ । इनके गुरु जलन्धरनाथ थे। इन्होनें ही गागदेव को तल्लीनाथ का नाम दिया था।

पंचमुखी पहाड़ी (पांचोटा गाँव, जालौर) पर घुडसवार के रूप में बाबा तल्लीनाथ की मूर्ति स्थापित है।

तल्लीनाथ जी ने शेरगढ (जोधपुर) ठिकाना पर शासन किया।

ये प्रकृति प्रेमी लोकदेवता के नाम से प्रसिद्ध है।

 

मेहा जी

ये मांगलियों के ईष्ट देव थे।

इनका मुख्य मंदिर बापणी गांव (जैसलमेर) में स्थित है।

घोडे़ का नाम किरड़ काबरा था।

ये जैसलमेर के राव राणगदेव भाटी से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

इनका मेला भाद्र कृष्णपक्ष अष्टमी को भरता है।

 

देवबाबा जी

ये गुर्जर जाति के आराध्य देव है।

इनका जन्म नगला जहाज (भरतपुर) में हुआ। इनका वाहन भैसा है।

इनका मेला वर्ष में दो बार भाद्र शुक्ल पंचमी तथा चैत्र शुक्ल पंचमी को भरता है।

इनको ग्वालों का पालन हारा कहते है।

 

वीर कल्ला जी

जन्म व जन्म स्थान

इनका जन्म मेडता (नागौर) में हुआ।

परिवार

मीरा बाई इनकी बुआ थी। इनके गुरु योगी भैरवनाथ थे।

उपनाम

इनको केहर कल्याण, कमथण योगी, शेषनाग का अवतार, चार भुजाओं वाले देवता कहा जाता है।

प्रमुख केंद्र

रनेला (नागौर), सामलिया तीर्थ (डूंगरपुर) तथा चित्तौड में छतरी है।

अन्य

1567 ई. में चित्तौडगढ़ के तृतीय साके के दौरान अकबर से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

इन्हें योगाभ्यास और जड़ी-बूटियों का ज्ञान था।

 

वीर फता जी

इनका जन्म सांथू गांव (जालौर) में हुआ। सांथू गांव में प्रतिवर्ष भाद्रपद सुदी नवमी को मेला लगता है।

 

डूंगजी- जवाहर जी

इनका केंद्र बठोठ पटोदा (सीकर) है।

ये शेखावटी क्षेत्र के लोकप्रिय देवता।

ये सगे भाई थे। जो अमीरों व अंग्रेजों से धन लूट कर गरीबों में बांट देते थे।

 

पंचवीर जी

शेखावत समाज के कुल देवता है।

शेखावटी क्षेत्र के लोकप्रिय देवता है।

अजीत गढ़ (सीकर) में मंदिर है।

 

बिग्गा जी/वीर बग्गा जी

ये जाखड़ समाज के कुल देवता माने जाते है।

इनका जन्म रीढी गाँव (बीकानेर) के जाट परिवार में हुआ।

इनके पिता का नाम रावमोहन तथा माता का नाम सुलतानी था।

मुस्लिम लुटेरों से गाय छुडाते समय वीरगति को प्राप्त हुए। इनका मंदिर बीकानेर में है।

 

पनराज जी

इनका जन्म नया गाँव (जैसलमेर) में हुआ। पनराज जी जैसलमेर क्षेत्र के गौरक्षक देवता है।

काठौड़ी गाँव के ब्राह्मणों की गाय छुडाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इनका मंदिर पनराजसर (जैसलमेर) में है।

 

मामादेव जी

इनको बरसात के देवता कहते है। ये पश्चिमी राजस्थान के लोकप्रिय देवता है।

मामदेव जी को खुश करने के लिए भैंसे की बली दी जाती है।

इनके मंदिरों में मूर्ति के स्थान पर लकड़ी के बनें कलात्मक तौरण होते है।

 

इलोजी जी

इनको छेडछाड़ वाले देवता कहते है। जैसलमेर पश्चिमी क्षेत्र में लोकप्रिय है।

इनका मंदिर इलोजी (जैसलमेर) में तथा केंद्र फालना (पाली) में है।

ये आजीवन कुंवारे रहे सुखद वैवाहिक जीवन के लिए इनकी पूजा की जाती है।

 

 

भोमिया जी

भूमि रक्षक देवता जो गांव-गांव में पूजे जाते है।

 

झुंझार जी

इनका केंद्र इमलोहा गाँव (सीकर) है।

 

भूरिया बाबा

सुकड़ी नदी के किनारे गौमतेश्वर (सिरोही) में इनका मंदिर है। ये मीणा जाति के आराध्य देव है।

वर्दीधारी पुलिस का इनके मेले में प्रवेश वर्जित है।

 

Note- रामदेव जी, गोगा जी, पाबु जी,हरभू जी, मेहा जी को मारवाड़ के पंच पीर कहते है।


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