राजस्थान के प्रमुख संत

राजस्थान के प्रमुख संत (Rajasthan Ke Pramukh Sant)

  1. वल्लभाचार्य
  2. रामानुजाचार्य
  3. चेतन्य महाप्रभु
  4. दादूदयाल
  5. हरिदास
  6. मीराबाई
  7. आचार्य भिक्षु स्वामी
  8. रामचरण दास
  9. चरणदास
  10. जसनाथ
  11. मावजी
  12. पीपा जी
  13. धन्ना
  14. रज्जब
  15. रैदास
  16. भक्त कवि दुर्लभ
  17. स्वामी लालगिरी
  18. जांभोजी
  19. प्राणनाथ जी
  20. गवरी बाई जी
  21. लालदास जी
  22. दरियाव जी
  23. हरिराम दास जी
  24. रामदास जी
  25. सुन्दरदास जी

 

 

(1) वल्लभाचार्य 

इन्होंने वल्लभ सम्प्रदाय की स्थापना की। जिसमें श्री कृष्ण की बाल रूप में पूजा होती है।

 

(2) रामानुजाचार्य

इन्होंने रामानुज सम्प्रदाय की स्थापना की। जिसमें राम की पूजा होती है।

(3) चेतन्य महाप्रभु

इन्होंने गौडीय सम्प्रदाय की स्थापना की। जिसमें गोविन्द देव की पूजा होती है।

 

(4) दादूदयाल जी 

इन्होंने गौडीय सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म अहमदाबाद (गुजरात) में हुआ तथा मृत्यु भैराना (जयपुर) में हुई। इनकी लाश को भैराणा की पहाड़ी पर छोड़ दिया गया। जिसको दादू खोल या दादूपालकी कहते है।

इनको राजस्थान का कबीर भी कहा जाता है। इनके गुरु वृद्धानंद जी है। जो कबीर के शिष्य थे। गुरु वृद्धानंद को बुडढण जी भी कहा जाता है। इनकी क्रमस्थली करडाला (नागौर), आमेर तथा सांभर रही है।

कल्यानपुर, सांभर, भैराणा, नरायणा तथा आमेर को दादू के शिष्य पंचतीर्थ मानते है। इनके उपदेश प्रमुख ग्रन्थ “दादूदयाल री वाणी” तथा “दादूदयाल रा दुहा” में है।

इनके शिष्य गरीबदास जी (पुत्र), मिस्किनदास जी (पुत्र), बखनाथ जी, रज्जब जी, सुंदरदास जी, संतदास जी, माधोदास जी, जगन्नाथ जी थे।

 

(5) हरिदास जी

इन्होंने निरंजनी सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म कापडोद गाव (डीडवाना) तथा मृत्यु गाडा गाव (नागौर) में हुई।

इनका मूल नाम हरिसिंह सांखला था। ये पहले डकैत थे। जो बाद में साधु बने इनको कलयुग का वाल्मीकि भी कहते है।

ये अकबर तथा जहांगीर के समकालीन थे। इनके उपदेश प्रमुख ग्रन्थ “मंत्र राज प्रकाश” तथा “हरिपुरुष जी की वाणी” में है।

(6) मीराबाई जी

इन्होंने दासी सम्प्रदाय की स्थापना की इनका जन्म मेड़ता (पाली) के कुड़की गाव में हुआ तथा द्वारिका / डाकोर (गुजरात) के रणछोड़ में मूर्ति में विलीन हो गयी

इनके पिता का नाम रतनसिंह राठौड़, माता का नाम खुशबू कंवर, पति का नाम भोजराज (राणा सांगा का पुत्र) तथा गुरु का नाम रैदास था। महात्मा गाँधी ने इनको प्रथम सत्यग्राही महिला कहा।


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(7) आचार्य भिक्षु स्वामी जी

इन्होंने तेरह साधु तथा तेरह श्रावक श्वेताम्बर जैन की तेरापंथी सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म जोघपुर के कंटालिया गाव में हुआ। इन्होनें आचार्य रघुनाथ जी से दीक्षा ली।

(8) रामचरण दास जी

इन्होंने रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म मालपुरा (टोंक) के सोड़ा गाव में तथा मृत्यु शाहपुरा (भीलवाड़ा) में हुई। इनके गुरु संत कृपाराम थे। इनका मूलनाम रामकिशन था। इनके उपदेश प्रमुख ग्रन्थ “अणर्भवाणी” में है।

इनकी प्रमुख पीठ शाहपुरा, रैण, सिंहथल तथा खेडापा में है।

 

(9) चरणदास जी

इन्होंने चरणदासी सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म अलवर के डेहरा गाव में हुआ। इनको सवाई जयसिंह –II के दरबार में मंत्रि पद मिला था। इनका मूलनाम रणजीत था।

इनके गुरु मुनि शुकदेव थे। इनके उपदेश प्रमुख ग्रन्थ “ब्रह्म ज्ञान सागर” “ब्रह्म चरित्र” “भक्ति सागर” तथा “ज्ञान स्वरोदय” में है। इनकी प्रमुख पीठ दिल्ली में है।

(10) जसनाथ जी

इन्होंने जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म बीकानेर के कतरियासर गाव में हुआ तथा इन्होंने 24 वर्ष की अवस्था में आश्विन शुक्ल सप्तमी को समाधि ली।

इनके पिता का नाम हम्मीर ज्याणी, माता का नाम रूपादे पत्नी का नाम कालदे तथा गुरु का नाम गोरखनाथ था। सिकन्दर लोदी ने इनको कतरियासर गाव में जमीन दी, जिसको गोरखमालिया कहते है। इनके उपदेश प्रमुख ग्रन्थ “सिंभूदड़ा” तथा “कोंड़ा” में है।

(11) मावजी

इन्होंने निष्कलंक सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म डूंगरपुर के साबला गाव में हुआ। इन्होंने सोम-माही-जाखम के संगम स्थान पर बेणेश्वर धाम की स्थापना की। जहां माघ पूर्णिमा को आदिवासियों का कुम्भ मेला लगता है।

(12) पीपा जी

इनका जन्म गागरोन (झालावाड़) में हुआ। ये गागरोन के राजा थे। इनका मूल नाम प्रतापसिंह खिंची था। इनके पिता का नाम कड़ावा राव, माता का नाम लक्ष्मीवती, पत्नी का नाम रानी सोलखंडी तथा गुरु का नाम रामानन्द था। ये दर्जी का काम करते थे इसलिए दर्जी समाज के आराध्य देव है।

पीपा जी का मंदिर समदडी (बाड़मेर) में, इनकी छतरी गागरोन (झालावाड़) में तथा इनकी गुफा टोडारायसिंह (टोंक) में है। इन्होंने फिरोजशाह तुगलक को हराया था। ये राजस्थान में भक्ति आन्दोलन के प्रारम्भकर्ता थे।

(13) धन्ना जी

ये जाट समाज के थे। इनका जन्म ध्रूवन कला/ धुआकला (टोंक) में हुआ। इनके गुरु रामानन्द थे। इन्होंने बिना बीज की खेती की।

(14) रैदास जी

ये चमार समाज के थे। ये कबीर के समकालीन थे। इनके उपदेश रैदास की पर्ची कहलाते है। ये मीराबाई के गुरु थे। इनकी छतरी चित्तौड़गढ़ के कुम्भश्याम मंदिर में है।


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(15) रज्जब जी

ये मुसलिम पठान समाज के थे। इनका जन्म तथा मृत्यु सांगानेर (जयपुर) में हुई। ये आजीवन दुल्हे के वेश में रहे तथा दादू के मृत्यु के बाद आजीवन आँखे बंद रखी इनके ग्रन्थ रज्जबवाणी तथा सवरंगी है।

(16) भक्त कवि दुर्लभ जी

इनका जन्म बांगड़ क्षेत्र (बांसवाडा तथा डूंगरपुर) में हुआ। इनको बांगड़ का संत तथा राजस्थान का नृसिंह कहते है। इनका कार्यक्षेत्र डूंगरपुर तथा बांसवाडा रहा।

(17) स्वामी लालगिरी जी

इन्होंने अलखिया सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म चुरू में हुआ इनकी प्रधान पीठ बीकानेर में है।

(18) जांभोजी

इन्होंने विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म नागौर के पीपासर गाव में हुआ। इनके पिता का नाम लोहट, माता का नाम हंसा बाई तथा गुरु का नाम गोरखनाथ था।

इनका मूल नाम धनराज था। इनको विष्णु का अवतार, गूंगा-गहला संत, पर्यावरण संत भी कहा जाता है। इन्होंने मुकाम गाव (बीकानेर) में समाधि ली जहाँ आश्विन तथा फाल्गुन आमवस्या को मेला लगता है।

इनका प्रमुख कार्य क्षेत्र सम्भराथल (बीकनेर) था। इनके मंदिर रामडावास (जोधपुर), जम्भा (जोधपुर), तथा जांगलू (बीकानेर) में है। इनके उपदेश प्रमुख ग्रन्थ “जंभसंहिता”, “जंभसागर” तथा “विश्नोई धर्म प्रकाश” में है। इनके उपदेश जंभसागर को पढ़ने वाले शब्दि या गयणा कहलाते है।

(19) प्राणनाथ जी

इनका जन्म जामनगर (गुजरात) में हुआ। इन्होंने परनामी सम्प्रदाय की स्थापना की। इनके सर्वाधिक अनुयायी आदर्श नगर जयपुर में है। इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ पन्ना (MP) में है।

(20 ) गवरी बाई

इनका जन्म नागरकुल (डूंगरपुर) में हुआ। ये बांगड़ की मीरा के नाम से विख्यात है।


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(21) लालदास जी

इन्होंने लालदासी सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका जन्म धोली दूव गाव (अलवर) में हुआ। इनके पिता का नाम चाँदमल, माता का नाम
समदा बाई तथा गुरु का नाम तिजारा निवासी संत गद्द्न चिस्ती (गद्दाम) था। ये मेव जाति के लकड़हारे थे। इनकी मृत्यु नगला गाँव (भरतपुर) में हुई तथा इनकी समाधि शेरपुर (अलवर) में है।

 

(22) दरियाव जी

इन्होंने रामस्नेही सम्प्रदाय की रैण शाखा की स्थापना की। इनका जन्म पाली के जैतारण गाव तथा मृत्यु रैण (नागौर) में हुई।

इनके पिता का नाम मान जी धुनिया, माता का नाम गीगण तथा गुरु का नाम प्रेमनाथ (बालकनाथ) था। इन्होनें राम में रा का अर्थ राम तथा म का अर्थ मुहम्मद बताया।

(23) हरिराम दास जी

इन्होंने रामस्नेही सम्प्रदाय की सिंहथल शाखा की स्थापना की। इनका जन्म तथा मृत्यु सिंहथल (बीकानेर) में हुई।

इनके पिता का नाम भागचन्द जी जोशी तथा गुरु का नाम जैसलदास जी था। इनके उपदेश प्रमुख ग्रन्थ “निसानी” में है।

 

(24) रामदास जी

इन्होंने रामस्नेही सम्प्रदाय की खेड़ापा शाखा की स्थापना की।

इनका जन्म जोधपुर के भिकमकोर गाव तथा मृत्यु खेड़ापा (जोधपुर) में हुई। इनके पिता का नाम शार्दुल जी, माता का नाम अणमी तथा गुरु का नाम हरिराम दास जी (सिंहथल शाखा) था।

 

(25) सुन्दरदास जी

इन्होंने दादू पंथ की नागा शाखा की स्थापना की। इनका जन्म दौसा में तथा मृत्यु सांगानेर (जयपुर) में हुई।

इनके पिता का नाम परमानन्द शाह चोखा तथा गुरु का नाम दादूदयाल जी था। इनके उपदेश प्रमुख ग्रन्थ “ज्ञान समुंद्र” “ज्ञान सवैया” “सुन्दर सार” “सुन्दरविलास” “सुन्दर ग्रंथावली” आदि में है।


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