विशिष्ट ऊतक/स्रावी ऊतक (Special Tissue or Secretory Tissue in Hindi)

विशिष्ट ऊतक/स्रावी ऊतक (Special Tissue or Secretory Tissue in Hindi)

 

Hey Biology Lovers, आज के हमारे ब्लॉग के शीर्षक है विशिष्ट ऊतक या स्रावी ऊतक (Special Tissue or Secretory Tissue in Hindi) । ये पादपो में पाये जाने वाले स्थायी ऊतक है चलो इनके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करते है।

विशिष्ट ऊतक या स्रावी ऊतक (Special Tissue or Secretory Tissue in Hindi): –

जन्तुओ के तरह, पादप में अपशिष्ट पदार्थों को निकलने के लिए उत्सर्जन तंत्र (Excretory System) नहीं पाया जाता। कोशिकाओं का प्रोटोप्लाज्म कुछ-उत्पादों को संग्रहीत करता है जिनका उपयोग भविष्य में कोशिका उपापचय (Metabolism) में किया जा सकता है। जैसे- रेजिन, गोंद, रबड़, तेल और वाष्पशील तेल आदि। कुछ पदार्थों का पौधे के द्वारा स्राव होता है। जैसे हॉर्मोन एवं एंजाइम तथा कुछ पदार्थों का पौधे के द्वारा उत्सर्जन किया जाता है। जैसे मकरंद, पाचन एंजाइम और जहरीले पदार्थ इत्यादि।

स्राव (Secretion) और उत्सर्जन (Excretion) दोनों  कार्य विशेष प्रकार के ऊतकों द्वारा किया जाता है, जिन्हें विशिष्ट ऊतक या स्रावीय ऊतक कहा जाता है। ये ऊतक स्थानीयकृत अर्थात पादप के किसी विशेष क्षेत्र में भी हो सकते  है या पादप शरीर में जगह –जगह पर वितरित यानी फैले हुए भी हो सकते है। इनकी कोशिकाओं में सघन, दानेदार कोशिका द्रव्य और केन्द्रक होता हैं।

विशिष्ट ऊतकों को निम्न दो भागो में वर्गीकृत किया जाता है:

  1. लैटेक्सधर ऊतक (Laticiferous Tissue)।
  2. ग्रंथिल ऊतक (Glandular Tissue)।

(A) लैटेक्सधर ऊतक (Laticiferous Tissue):-

ये लम्बी, अधिक शाखित, बहु-केन्द्रित तथा पतली भित्ति वाली जीवित कोशिकाओं से बना होता है। जिनके अंदर दूध जैसा गाढ़ा रस भरा होता है, जिसे लैटेक्स (Latex) कहते है। लैटेक्स को पादप दुग्ध (Plant Milk) भी कहा जाता है। लैटेक्सधर ऊतक का निर्माण मेरिस्मेटिक ऊतक से होता है। ये पादप के सभी भागों के भरण ऊतकों (Ground Tissue) में फैले हुए होते हैं।

लैटेक्स एक इमल्सिकृत पदार्थ (Emulsified Material) है, जिसमें विभिन्न कार्बनिक पदार्थ शामिल हैं जैसे शर्करा, प्रोटीन, एंजाइम, स्टार्च, एल्किलॉइड, श्लेष्मा, रबड़, रेजिन, टेनिन आदि। लैटेक्स में पाए जाने वाले स्टार्च कण के कण डम्बल रूपी होते है।

लैटेक्सधर ऊतक Moraceae, Apocynaceae, Musaceae, Euphorbiaceae,  Papaveraceae., Compositate (Asteraceae), Urticaceae, Asclepiadaceae आदि पादप कुलों में पाया जाता है


विशिष्ट ऊतक या स्रावी ऊतक (Special Tissue or Secretory Tissue in Hindi)


लैटेक्स के कार्य –

  1. यह पादपों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  2. यह पादपों को जीवाणुओं तथा कवको के संक्रमण से बचाता है।

संरचनात्मक रूपों के आधार पर लैटेक्सधर ऊतक को दो प्रकार में विभाजित किया जाता है –

  1. लैटेक्स कोशिकाएं (Latex Cells)
  2. लैटेक्स वाहिकाएं। (Latex Vessels)

 

1. लैटेक्स कोशिकाएं (Latex Cells): –

इनको रबड़ क्षीर कोशिकाएं भी कहते है। ये लम्बी नलिकाकार शाखित या अशाखित जीवित कोशिकाएं है। युवा लैटेक्स कोशिकाएं बहुत छोटी और सिनोसिटिक यानी बहुकेन्द्रकी होती है। इनकी कोशिका भित्ति बहुत पतली होती है। और सेल्युलोज की बनी होती है।

लैटेक्स कोशिकाएँ एक दूसरे के साथ जुड़ती नहीं है, जैसे की लैटेक्स वाहिकाएं एक दुसरे से जुड़ती है, इसलिए लैटेक्स कोशिकाओं को सरल लैटेक्स (Simple Latex) या असंधित लैटेक्स (Non- Articulated) कहा जाता है।

लैटेक्स कोशिकाएं Euphorbiaceae,  Asclepidiaceae, Apocynaceae, and Urticaceae आदि पादप कुलों  में पाई जाती है। सामान्यता केलोट्रोपिस या आक, युफोर्बिया या नागफनी, कनेर या नेरियम, फाइकस या बरगद आदि में लैटेक्स कोशिकाएं पायी जाती है।

2. लैटेक्स वाहिकाएं ( Latex Vessels):

इनको रबड़ क्षीर वाहिकाएं भी कहते है। लैटेक्स वाहिकाएं का निर्माण लैटेक्स कोशिकाओं के मिलने तथा उनके बीच की अंत: भित्ति के घुल जाने से होता है। ये कोशिकाएं जीवित मृदुतकी कोशिकाएँ होती हैं, और बहुकेन्द्रकी सिनोसिटिक होती है। लैटेक्स वाहिकाएं आपस में मिलकर अनुप्रस्थ जाल जैसी संरचना बनाती इसलिए, लैटेक्स वाहिकाओं को संधित लैटेक्स (Articulated Latex) या संयुक्त लैटेक्स (Compound Latex) कहा जाता है। उदाहरण: लैटेक्स वाहिकाएं (Vessels) Compositae (Sonchus), Euphorbiaceae (Hevea), और Papaveraceae (Argemone)  में पायी जाती है।

  • सर्वाधिक विकसित लैटेक्स वाहिकाएं पॉपी (Poppy) के कच्चे फलों की फलभित्ति (Pericarp) में पाई जाती है। पैपेवर सोम्नीफेरम के लैटेक्स से अफीम प्राप्त होती है। अफीम में मॉर्फिन नामक एल्केलॉइड होता है। पपीता के लैटेक्स में पेपेन नामक एंजाइम पाया जाता है।
  • व्यापारिक रबर हिविया ब्रासीलैन्सिस से प्राप्त होता है। फाइकस इलास्टिका से भारतीय रबर प्राप्त होता है।
  • लैटेक्स का अफीम गहरे भूरे रंग का, आर्जीमोन एवं सोंकस में पीला रंग का, आक में सफ़ेद तथा  केले में रंगहीन होता है।

कार्य:

  1. लैटेक्सधर ऊतक स्टार्च के रूप में खाद्य सामग्री को भंडारित करता है।
  2. यह जलोद्भिद पादप तथा कैलोट्रोपिस व नेरियम में पानी को अवशोषित करता है, और संग्रहीत करता है।
  3. Heuea brassiliemis और Ficus elastica लैटेक्सधर से रबड़ तैयार किया जाता है।
  4. पेपेन पपीता के लैटेक्स से तैयार किया जाता है। पेपेन एक प्रोटीऐज एंजाइम है जो प्रोटीन का पाचन करता है।
  5. चेविंग गम चीकू के लैटेक्स से तैयार किया गया है।
  6. यह जहरीले पदार्थों का स्राव करके पादप को चराई करने वाले पशुओं से बचाता है। जैसे कैलोट्रोपिस से स्रावित एल्केलॉइड उसे चरने से बचाता है।

 विशिष्ट ऊतक या स्रावी ऊतक (Special Tissue or Secretory Tissue in Hindi)

(B) ग्रंथिल ऊतक (Glandular Tissue): –

यह ऊतक ग्रंथियों का बना होता है। इसमें स्रावी अथवा उत्सर्जी पदार्थ उपस्थित होते है। ग्रंथिल ऊतक

में दो प्रकार की ग्रंथियां पाई जाती है –

1. एक कोशिकीय ग्रंथियां (Unicellular Glands) –

ये ग्रंथियां पत्तियों की सतह पर पाई जाती है ये कांटेनुमा ग्रंथियां होती है उदाहरण बिच्छू बूटी (Urtica)

2. बहुकोशिकीय ग्रंथियां (Multicellular Glands) –

ये दो प्रकार की होती है –

i. बाह्य ग्रंथियां (External Glands) –

ये पादप सतह पर उपस्थित होती है तथा बह्यात्व्चा अति वृद्धि के रूप में निकलती है ये निम्न प्रकार की होती है –

ग्रंथिल रोम (Glandular Hair)  – ये तम्बाकू एवं प्लमबगो में गोंद के समान चिपचिपा पदार्थ का स्राव करती है।

मकरंद ग्रंथियां (Nectar Glands) – ये ग्रंथियां शर्करा के विलयन का स्राव करती है। ये ग्रंथियां पुष्पीय भागों, मुख्यतः पुष्पासन में पाई जाती है। ये ग्रंथिल कीटों को आकर्षित करने हेतु मकरंद का स्राव करती है, लेकिन पैशन पुष्प (Passi flora) में मकरंद ग्रंथियां उसकी पत्तियों में पाई जाती है।

दंशक रोम (Stinging Hair) – ये ग्रंथियां विषैले पदार्थों को स्रावित करती है उदाहरण – बिच्छू बूटी तथा नेटल। नेटल की पत्तियों पर पाये जाने वाले रोम मेथेनॉइक अम्ल / फोर्मिक अम्ल स्रावित करते है।

 

ii. आंतरिक ग्रंथियां (Internal Hair) –

ये ग्रंथियां ऊतकों में धंसी हुई होती है। ये भरण ऊतक में पायी जाने वाली इडीयोब्लास्ट है । ये निम्न प्रकार की होती है –

पाचक ग्रंथियां (Digestive Glands) – ये कीटाहारी पादपों में पाई जाने वाली पाचक ग्रंथियां होती है, जो प्रोटियोलाइटिक एंजाइम स्राव करती है। ये युट्रीकुलेरिया, ड्रोसेरा, डायोनिया, निप्रेन्थीस आदि में पायी जाती है। युट्रीकुलेरिया राजस्थान में पाया जाने वाला जलीय पादप है।

श्लेषमा स्रावी ग्रंथियां (Mucilage Secreting Glands) – ये ग्रंथियां श्लेष्मा स्राव करती है। ये पान की पत्तियों में पाई जाती है।

तेल ग्रंथियां (Oil Glands) – ये वाष्पशील तेल का स्राव करती है। ये तेल एंटीसेप्टिक का कार्य करता है। ये नीबुं, संतरा, आदि में फलों तथा पत्तियों में पाई जाती है। इन ग्रंथियों को ऑस्मोफोर्स (Osmophore) कहते है।

जल ग्रंथियां(Water Glands) – इनको हाइडैथोड (Hydathode)या जल रंध भी कहते है, ये ग्रंथियां बिंदु स्राव का कार्य करती है।  ये टमाटर, जलकुम्भी, कोलोकैसिया आदि में पाई जाती है। ये सामान्यता नम स्थानों में उगने वाले पादपों की पत्तियों के किनारों पर पायी जाती है। जल ग्रंथियां संरचनात्मक रूप से रंधो के है, लेकिन ये शिराओं के शीर्ष में स्थित होते है इनके छिद्र (pores) हमेशा खुले  रहते है। ये आकार में रंधो की तुलना में बड़े होते है

अन्य –
  1. टैमेरिक्स (Tamarix) में लवण ग्रंथियां (Salt Glands) पायी जाती है। जो सोडियम क्लोराइड का स्राव करती है।
  2. प्लम्बेजिनेसी (Plumbaginaceae) कुल चॉक ग्रंथियां (Chalk Glands) पाई जाती है जो कैल्शियम कार्बोनेट का स्राव करती है।
  3. रेजीन ग्रंथियां पाइनस के तने में पायी जाती है।
  4. टैनिन ग्रंथियां चाय की पत्तियों में पायी जाती है।
  5. युकेलिप्टस की पत्तियों में पायी जाने वाली तेल ग्रंथियां से तेल प्राप्त होता है जिसका औषधीय महत्व है।

 

 

(ए) लयजात गुहा (Lysogenous Cavities):-

ये गुहा स्रावी कोशिकाओं के समूह के विघटन से बनती हैं। इन स्रावी कोशिकाओं में एक बड़ी-रिक्तिका और प्रोटॉप्लाज्म है। स्रावी कोशिकाओं के विघटन के बाद रिक्तिका में संग्रहीत उत्पादों को गुहा में छोड़ दिया जाता है। लयजात गुहा सिट्रस फलो और युकेलिप्टस / नीलगिरी की पत्तियों में वाष्पशील तेल को संग्रहित करती है।

(बी) वियुक्तिजात गुहा (Shizogenous Cavities): –

ये गुहा ऊतकों में अन्तरकोशिकीय अवकाश के बढ़ने से बनते हैं। गुहा परतों से घिरी हुई होती है इन परतों में  ग्रंथिल कोशिकाएँ होती है जो सघन कोशिका द्रव्य और केन्द्रक युक्त होती हैं।

इन कोशिकाओं के द्वारा विभिन्न उत्पादों जैसे रेजिन, टैनिन इत्यादि को गुहा में स्रावित किया जाता हैं। उदाहरण रेजिन नाल एक वियुक्तिजात गुहा है, जो Compositae, Umbelliferae पादप कुलों में पायी जाती है।


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This Post Has 2 Comments

  1. good work

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