जयपुर से जुडी जनरल नॉलेज

जयपुर से जुडी जनरल नॉलेज

राजस्थान की राजधानी जयपुर की स्थापना कछवाहा वंश के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 9 खेलों का अधिग्रहण करके की थी। जुलाई 2019 में यूनेस्को द्वारा जयपुर को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी का दर्जा दिया गया है।

इसकी स्थापना 18 नवंबर 1727 में हुई जयपुर के स्थापना के लिए नींव का पत्थर गंगापोल पर लगाया गया था।
जयपुर को भारत का पेरिस, गुलाबी नगर, रंगश्री का द्वीप, आइसलैंड ऑफ ग्लोरी आदि नामों से जाना जाता है। जयपुर की बसावट जर्मनी के शहर एल्ट स्टडट एर्लग के आधार पर किया गया।

पूरे शहर में नो आड़ी रेखाएं तथा नौ सीधी रेखाएं है जो चौपड़ पैटर्न बनाती है। जयपुर के प्रमुख वास्तुकार विद्याधर चक्रवर्ती और आनंद राम मिस्त्री थे और इनके सलाहकार मिर्जा इस्माइल थे। जिनके नाम पर एमआई रोड का निर्माण हुआ। जयपुर का पुराना नाम जयनगर था।

जयपुर को गुलाबी रंग करवाने का श्रेय कछवाहा राजा रामसिंह द्वितीय को जाता है। इन्होने इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ तथा प्रिंस ऑफ वेल्स युवराज अल्बर्ट के स्वागत में जयपुर को गुलाबी रंग करवाया।

जयपुर में 7 प्रवेश द्वार  है। जो-

  1. अजमेरी गेट
  2. सांगानेरी गेट
  3. घाट गेट
  4. चांदपोल गेट
  5. सूरजपोल गेट
  6. न्यू गेट
  7. ध्रुवपोल गेट

 

जयपुर में सरकारी संस्थाएं

जयपुर में निम्नलिखित सरकारी संस्थाएं स्थित है-

  1. राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान
  2. राजस्थान लोक प्रशासन संस्थान
  3. हस्तशिल्प कागज राष्ट्रीय संस्थान
  4. राजस्थान संगीत संस्थान
  5. राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट इसको मदरसा हुनरी कहा जाता था। इसका निर्माण सवाई राम सिंह द्वारा करवाया गया।
  6. भारतीय प्राचीन ज्योतिष संस्थान
  7. राजस्थान ललित कला अकादमी
  8. गुरु नानक संस्थान
  9. राजस्थान कला संस्थान
  10. राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी
  11. जयपुर कत्थक केंद्र
  12. राजस्थान सिंधी अकादमी
  13. जवाहर कला केंद्र

जयपुर के ऐतिहासिक तथा पर्यटन स्थल

जयपुर में निम्नलिखित ऐतिहासिक तथा पर्यटन स्थल स्थित है

हवा महल

इसका निर्माण सवाई प्रताप सिंह के द्वारा 1799 ईस्वी में करवाया गया। यह पांच मंजिला भव्य इमारत है इसके कारीगर लालचंद कारीगर थे। इसका आकार कृष्ण के मुकुट के समान है।
हवा महल में निम्नलिखित मंजिलें हैं-

  1. पहली मंजिल शरद मंदिर
  2. दूसरी मंजिल रतन मंदिर
  3. तीसरी मंजिल विचित्र मंजिल
  4. चौथी मंजिल प्रकाश मंदिर
  5. पांचवी मंजिल हवा मंदिर

 

जंतर मंतर

इसका निर्माण 1718 में सवाई जयसिंह द्वितीय के द्वारा करवाया गया। इसकी स्थापना ज्योतिष एवं नक्षत्र विद्या की वेधशाला प्रयोगशाला के आधार पर किया गया।

यहां विश्व की सबसे सौर घड़ी है, जिसका नाम सम्राट यंत्र है। इनके अलावा यहां पर प्रकाश नापने के लिए जय प्रकाश यंत्र व ऊंचाई मापने हेतु राम यंत्र है।

तख्ते शाही महल

यह मोती डूंगरी में एक पहाड़ी पर स्थित है इसका निर्माण सवाई माधो सिंह द्वारा किया गया।

ईसरलाट

इसकी स्थापना 1750 में महाराजा ईश्वरी सिंह ने टोंक के राज महल पर युद्ध विजय होने के उपलक्ष में विजय स्तंभ के रूप में करवाया गया। इसे स्वर्गसुली भी कहा जाता है।

राज महल

इसको सिटी पैलेस भी कहा जाता है। इसकी स्थापना 1980 में महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय द्वारा की गई थी।

इसे पूर्वी प्रदेश द्वार को शिर्डी कहते हैं।

सिटी पैलेस में मुबारक महल, चंद्र महल, सीलखाना, दीवाने आम, दीवाने खास तथा पोथीखाना स्थित है। दीवाने आम में स्थित राजा के निजी पुस्तकालय को पोथीखाना कहा जाता है। सिटी पैलेस में मुबारक महल अतिथियों के ठहरने के लिए बनवाया गया था।

सिटी प्लेस में विश्व के सबसे बड़े चांदी के पत्थर तथा बिछावन पर सुई से बारीक काम विश्व प्रसिद्ध है।

शीश महल

यह आमेर में स्थित है। इसको जय मंदिर तथा यश मंदिर भी कहा जाता है। इसमें शीशे व कांच के टुकड़ों की सजावट के कारण इस को शीश महल कहा जाता है‌।

इसका निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा करवाया गया। महाकवि बिहारी ने इसे दर्पण धाम कहा है।

आमेर का महल

आमेर की झील के पास पहाड़ी पर स्थित महल आमेर का महल है। इसका निर्माण राजा मान सिंह द्वारा 1592 में करवाया गया।

हाड़ी रानी का मंदिर

यह आमेर में स्थित है।

जल महल

जयपुर से जुडी जनरल नॉलेज

जयपुर से जुडी जनरल नॉलेज

जयपुर के आमेर में आमेर की घाटी के नीचे जयसिंहपुरा खोर गांव के पास दो पहाड़ियों के बीच की घाटी को काटकर एक झील का निर्माण करवाया गया है। इस झील में जल महल स्थित है। इसकी स्थापना मानसिंह द्वितीय ने की थी। तथा झील को मानसागर झील कहा जाता है।

सामोद महल

चोमू से 9 किलोमीटर दूर सामोद महल स्थित है‌। जिसमें शीश महल व सुल्तान महल दर्शनीय स्थल है। शीश महल में कांच का कार्य तथा सुल्तान महल में शिकार के दृश्य देखने योग्य हैं।

जयपुर के प्रसिद्ध किले एवं गढ़

जयपुर में निम्नलिखित प्रसिद्ध किले एवं गढ़  स्थित है- –

नाहरगढ़ का किला

इसको सुदर्शन गढ़ भी कहा जाता है। इसका निर्माण 1734 में सवाई जयसिंह ने प्रारंभ किया था और वर्तमान स्वरूप सवाई राम सिंह द्वारा प्रदान किया गया।

यह अरावली पर्वत माला पर स्थित है। यह जयपुर के मुकुट के समान है। इसमें सवाई माधो सिंह द्वितीय के द्वारा अपनी 9 पासवानों के लिए 9 महलों का निर्माण करवाया गया है, जो निम्न है

  1. सूरज प्रकाश
  2. चांद प्रकाश
  3. लक्ष्मी प्रकाश
  4. ललित प्रकाश
  5. बसंत प्रकाश
  6. फूल प्रकाश
  7. खुशहाल प्रकाश
  8. आनंद प्रकाश
  9. जवाहर प्रकाश

 

जयगढ़ का किला

इसका निर्माण सवाई जयसिंह ने 1726 ईस्वी में करवाया इसको चिल्ह का टोला कहा जाता है, क्योंकि इसमें दबे हुए खजाने स्थित है।

जयगढ़ में एशिया की सबसे बड़ी तोप जयबाण तोप है। जयगढ़ के प्रमुख प्रवेश द्वार-डूंगर दरवाजा, अवनी दरवाजा तथा भेरुव दरवाजा है।

जय गढ़ में सात मंजिला प्रकाश स्तंभ बना हुआ है जिसे दिया बुर्ज कहते हैं।

जयगढ़ के अंदर छोटा दुर्ग बना हुआ है, जिसे विजयगढ़ी दुर्ग कहते हैं। इसमें सवाई राजा जयसिंह ने अपने छोटे भाई विजय सिंह को कैद करके रखा था।

आमेर का किला

दरअसल यह एक दुर्ग है जो गिरी दुर्ग प्रकार का दुर्ग है। इसका निर्माण 1150 में धोलाराय ने करवाया था। आमेर का प्रवेश द्वार गणेशपोल कहलाता है। जिसके ऊपर चतुर्भुज गणेश की आकृति स्थित है। गणेश द्वार या गणेश पोल पर फ्रेस्को पद्धति का रूप दिखाई देता है।

आमेर के दुर्ग में सौभाग्य मंदिर तथा आमेर का महल स्थित है।

माधो राजपुरा का किला

जयपुर में स्थित इस किले के साथ आमिर खान पिंडारी की बैगमों को पकड़ कर लाने वाले राजपूत भगत सिंह नरूका की वीरता की दास्तान जुड़ी हुई है।

मोरीजा किला

यह जयपुर जिले की के गोविंदगढ़ में स्थित है।

करणसर किला

यह जयपुर से 50 किलोमीटर दूर हिंगोनिया के निकट करणसर किला स्थित है। इसका निर्माण बहादुर सिंह राणावत ने करवाया था। यह चौबुजा किला कहलाता है।

जयपुर से जुडी जनरल नॉलेज

 

जयपुर की प्रमुख झीलें

जय पुर की प्रमुख झीलें निम्नलिखित है-

सांभर झील

यह भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है। इसमें देश का सर्वाधिक नमक उत्पादन होता है। इसमें झील उत्पादन नमक उत्पादन सांभर साल्ट लिमिटेड के द्वारा किया जाता है। जो हिंदुस्तान साल्ट कंपनी लिमिटेड की सहायक कंपनी है।

मावठा झील

इसके पास आमेर का महल स्थित है।

गतला झील

यह जयपुर का बनारस कहलाता है। इसका गालव ऋषि के आश्रम के लिए किया गया। इसमें एक कुंड है, जिससें गोमुख से निरंतर पानी बहता रहता केहै। इसमें बन्दरों की अधिकता होने पर इसे जयपुर की मंकी वैली कहते हैं। यहां पर पयोहारी जी के स्थल, अलखनाथ मंठ तथा सीताराम मंदिर स्थित है।

 

मानसागर झील

जल महल इसी झील में स्थित है। इसका निर्माण मानसिंह द्वितीय ने करवाया था।

 

जयपुर के  प्रसिद्ध मंदिर

जयपुर में निम्नलिखित प्रसिद्ध मंदिर स्थित है-

शीलादेवी का मंदिर

यह आमेर के महल में स्थित है, महाराजा मानसिंह ने बंगाल के जसौर के शासक केदार को हराकर शिला माता की मूर्ति को इस मंदिर में स्थापित किया।

जगत शिरोमणि मंदिर

यह मंदिर भी आमेर में स्थित है। इसका निर्माण महाराजा मानसिंह की रानी कनकावती ने अपने पुत्र जगत सिंह की याद में बनवाया था। इसमें मीराबाई द्वारा पूजा जाने वाली कृष्ण की काले पत्थर की मूर्ति स्थित है। यह एक वैष्णव मंदिर है।

गोविंद देव जी का मंदिर

इसका निर्माण 1735 में सवाई जयसिंह ने करवाया था। यह सिटी प्लस के पीछे जयनिवास बगीचे में स्थित है। इसमें वृदावन से लाई गई गोविंद देव जी की मूर्ति स्थित है। यह गौडिया वल्लभ संप्रदाय का प्रसिद्ध मंदिर है।

गणेश मंदिर

यह जयपुर के मोती डूंगरी की तलहटी में स्थित है। इसका निर्माण महाराजा माधोसिंह प्रथम ने करवाया था। इसमें गणेश की प्रतिमा स्थित है। जो माधो सिंह प्रथम की पटरानी अपने पीहर से लेकर आई थी।

बिड़ला मंदिर

जयपुर के मोती डूंगरी के निकट लक्ष्मी नारायण का मंदिर स्थित है। जिसका निर्माण गंगाप्रसाद बिड़ला के द्वारा करवाया गया था। इसमें भगवान नारायण व देवी लक्ष्मी की मूर्ति स्थित है। इसमें लगे हुए कांच बेल्जियम से आयात किए गए।

कनक वृंदावन मंदिर

जल महल के निकट यह मंदिर स्थित है‌। इसका निर्माण सवाई जयसिंह द्वारा करवाया गया।

राजेश्वर मंदिर

यह मंदिर केवल शिवरात्रि को ही खुलता है‌।

नकटी माता का मंदिर

जयपुर के निकट जय भवानीपुरा में नकटी माता का मंदिर स्थित है।

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बैराठ
सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन यहां पर मौर्य कालीन अशोक के शिलालेख तथा मध्यकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
प्राचीन काल में यह विराट नगर के नाम से प्रसिद्ध था। यहां खुदाई में एक गोल मबुद्ध मंदिर, मृदुपात्र तथा 36 मुद्राएं प्राप्त हुई है। जिनमें 8 चांदी की पंचमार्क मुद्राएं तथा 28indo-greek मुद्राएं हैं जिनमें राजा मिनेन्डर की प्रतिमा है।
यहां भीम की डूंगरी स्थित है। जहां पर पांडवों ने अज्ञातवास निकाला था। इसलिए से पांडू हिल भी कहते हैं।

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