पादप जल सम्बन्ध (Plant Water Relation)

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पादप जल सम्बन्ध (Plant Water Relation)

पादप शरीरक्रिया विज्ञान (Plant Physiology)

यह वनस्पति विज्ञान की एक शाखा है, जिसमें पादप के आंतरिक भागों की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया जाता है। स्टीफन हैल्स (Stephen Hales) को पादप शरीरक्रिया विज्ञान का जनक  (Father of Plant Physiology) कहते है।

सर जे.सी.बोस (J.C.Bose) को भारतीय पादप शरीरक्रिया विज्ञान का जनक (Father of Indian Plant Physiology) कहते है।

 

विसरण (Diffusion)

किसी पदार्थों के अणुओं (Molecules), परमाणुओं (Atoms) या आयनों (Ions) की अपनी अधिक सांद्रता (High Concentration) से कम सान्द्रता वाले (Law Concentration) क्षेत्र की ओर होने वाली गति को विसरण (Diffusion) कहते है।

विसरण की प्रक्रिया पदार्थों के अणुओं में उपस्थित गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) के कारण होती है।

इसको निम्न प्रयोग द्वारा समझ सकते है।

यदि एक पात्र के मध्य में एक प्लास्टिक की प्लेट लगा दी जाए और इसके दोनों ओर जल भर दिया जाए तथा एक ओर जल में नमक मिला दिया जाए।

जब इनके मध्य में से प्लास्टिक की प्लेट हटा दी जाती है, तो नमक के अणु केवल जल वाले भाग की ओर तथा केवल जल वाले भाग से जल के अणु नमक वाले विलयन की ओर गति करते हैं। जो विसरण को दर्शाता है।

जल तथा नमक के अणुओं का विसरण एक दुसरे से स्वतंत्र रहता है। अतः एक स्वतंत्र प्रक्रिया है।

 

विसरण की दर  को प्रभावित करने वाले कारक (Factor Affecting Rate of Diffusion)

तापमान (Temperature)

ताप बढने पर विसरण की दर बढ़ती है, क्योंकि ताप बढ़ने पर अणुओं की गतिज ऊर्जा में वृद्धि होती है।

विसरित होने वाले पदार्थ का आकार (Size of diffused substances)

पदार्थ के अणुओं का आकार बढ़ने पर विसरण की दर घटती है।

विसरित होने वाले पदार्थ का द्रव्यमान (Mass of diffused substances)

पदार्थ के अणुओं का द्रव्यमान बढ़ने पर विसरण की दर घटती है।

विसरित होने वाले पदार्थ का घनत्व (Density of diffused substances)

पदार्थ के अणुओं का द्रव्यमान बढ़ने पर विसरण की दर घटती है। विसरण की दर घनत्व के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

अतः

विसरण की दर = गैस > द्रव > ठोस

विसरण दाब (Diffusion pressure)

विसरण हमेशा अधिक विसरण दाब से कम विसरण दाब की ओर होता है।

 

पादप जल सम्बन्ध (Plant Water Relation in Hindi)

पारगम्यता (Permeability)

पदार्थों के किसी झिल्ली (Membrane) को पार करने की क्षमता अथार्त झिल्ली (Membrane) के अंदर जाने और बाहर आने की प्रक्रिया को पारगम्यता कहा जाता है।

पारगम्यता (Permeability) के आधार पर झिल्लीयों को निम्न भागों में विभक्त किया जाता है-

पूर्ण पारगम्य (Permeable)

पदार्थ झिल्ली (Membrane) के आर-पार आजा सकता है। उदाहरण कोशिका भित्ति (Cell wall)।

 

अपारगम्य (Impermeable)

पदार्थ झिल्ली (Membrane) के आर-पार नहीं आजा सकता है। उदाहरण क्यूटीकल तथा सुबेरिन की बनी परत।

 

चयनात्मक पारगम्य (Selectively Permeable)

कुछ पदार्थ झिल्ली (Membrane) के आर-पार आजा सकते है। लेकिन कुछ नहीं। उदाहरण कोशिका झिल्ली (Cell Membrane)।

 

अर्द्धपारगम्य (Semi Permeable)

विलायक जैसे की जल झिल्ली (Membrane) के आर-पार आजा सकते है। लेकिन विलेय जैसे नमक नहीं। उदाहरण जंतुओं के आशय की झिल्ली, अन्डे की झिल्ली।

 

परासरण (Osmosis)

इसको परासरणीय विसरण (Osmosis Diffusion) भी कहते है।

जब दो विभिन्न सान्द्रता वाले विलयनों को अर्द्धपारगम्य झिल्ली (Semi Permeable Membrane) के द्वारा पृथक कर दिया जाता है, तब विलायक (Solute) का कम सान्द्रता वाले विलयन (Solution) से अधिक सान्द्रता वाले विलयन की तरफ अर्द्धपारगम्य झिल्ली से होकर जाना, परासरण (Osmosis) कहलाता है।

परासरण को निम्न प्रयोग से समझ सकते है-

एक U आकार की नली के मध्य में एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली लगा देते है। इसके एक ओर केवल पानी भरते तथा दूसरी ओर पानी व नमक का विलयन डालते है।

पादप जल सम्बन्ध (Plant Water Relation)

source – pubs.rsc.org

केवल पानी वाले भाग से पानी के अणु नमक के विलयन वाले भाग की ओर जाते है। जो परासरण को दर्शाता है

 

 

परासरण के प्रकार (Types of Osmosis)

परासरण दो प्रकार का होता है-

अंत:परासरण (Endosmosis)

जब कोशिका को अल्पपरासरी विलयन में रखते है तो जल कोशिका में प्रवेश करता है, तो इसे अंत:परासरण (endosmosis) कहते हैं जैसे किशमिश जो जल में रखने पर किशमिश का फूलना तथा

बाह्य परासरण (Exosmosis)

जब कोशिका को अतिपरासरी विलयन में रखते है तो कोशिका से जल का बाहर निकलना बाह्य परासरण (exosmosis) कहलाता हैं।

जैसे अंगूरों को नमक के घोल में रखने पर अंगूरों का सिकुड़ना।

पादप जल सम्बन्ध (Plant Water Relation In Hindi)

विलयनों के प्रकार (Types of Solution)

समपरासरी विलयन (Isotonic solution):-

ऐसा विलयन जिसकी सांद्रता कोशिका रस की सांद्रता के बराबर होती है, तो इसे समपरासरी विलयन कहते हैं।

न्यून परासरी या अधोपरासरी या अल्पपरासरी विलयन (Hypotonic solution):-

ऐसा विलयन जिसकी सांद्रता कोशिका रस की सांद्रता की तुलना में कम होती है। अल्पपरासरी विलयन कहलाता है। ऐसे विलयन में किसी कोशिका को रख देने पर उसमें अंत: परासरण (endosmosis) होता है। जिससे कोशिका फुल जाती है।

जैसे – किशमिश को पानी में रखने पर उनका फूलना।

अति परासरी विलयन (Hypertonic solution):-

ऐसा विलयन जिसकी सांद्रता कोशिका रस की सांद्रता की तुलना में अधिक होती है, अतिपरासरी  विलयन कहलाता है।

इस विलयन में किसी कोशिका को रखने पर उसमें बर्ही: परासरण (exosmosis) होता है। जिसके कारण कोशिका सिकुड़ जाती है।

जैसे – अंगूरों को सान्द्र शर्करा विलयन में रखने पर सिकुड़ जाते हैं।

 

जीवद्रव्य कुंचन (Plasmolysis)

किसी कोशिका को अतिपरासरी विलयन में रखने पर कोशिका का जीवद्रव्य कोशिका भित्ति से पृथक होकर सिकुड़ना प्रारम्भ कर देता है। इसको जीवद्रव्य कुंचन (plasmolysis) कहते है।

 

विसरण दाब (Diffusion pressure)

विसरित होने वाले पदार्थ के अणु या आयन विसरित होते समय किसी माध्यम पर एक दाब डालते है, उसे विसरण दाब (DP) कहते है।

शुद्ध विलायक (solvent) का विसरण दाब सदैव ही विलयन (solution) से अधिक होता है। विलेय (solute) मिलाने से विलायक का विसरण दाब कम हो जाता है।

 

विसरण दाब न्यूनता (Diffusion pressure Deficit)

विलायक में विलेय (solute) मिलाने से विसरण दाब में हुई कमी विसरण दाब न्यूनता कहलाती है।

DPD ∝ Conc. of solution

शुद्ध जल का विसरण दाब सर्वाधिक होता है, जब इसमें कोई विलेय मिलाया जाता है तो इसके विसरण दाब में कमी आ जाती है। यह कमी ही DPD होती है। शुद्ध जल का विसरण दाब शून्य होता है अतः DPD का मान ऋणात्मक होता है।

विसरण दाब न्यूनता को चुषण दाब (Suction Pressure), पानी की मांग, कोशिका की जल अवशोषण शक्ति भी कहते है।

 

जल का विसरण कम DPD से अधिक DPD क्षेत्र की और होता है।

कम DPD à अधिक DPD

 

 

स्फीति दाब (Turgor pressure or T.P)

जब एक पादप कोशिका को अल्पपरासरी विलयन में रखा जाता है, तो जल के अणु कोशिका में प्रवेश करते है। जिसके कारण जीवद्रव्य या कोशिका द्रव्य, कोशिका भित्ति पर बाहर की ओर दबाव डालता है। इस दबाव को स्फीति दाब (T.P.) कहते है।

इसको द्रव्य स्थैतिक दाब (Hydrostatic Pressure) भी कहते हैं।

 

भिति दाब (Wall pressure or W.P)

कोशिका भित्ति दृढ होने के कारण स्फीति दाब के बराबर दाब परन्तु, विपरीत दिशा में जीवद्रव्य पर दाब डालती है। इसे भित्ति-दाब (wall pressure) कहते हैं।

भित्तिदाब (wall pressure) तथा स्फीतिदाब (T.P) आपस में बराबर होते हैं। किन्तु विपरीत दिशा में होते है।

TP = -WP

  • श्लथ कोशिका (turgid cell) में स्फीति दाब (TP) व भित्तिदाब (WP) का मान अधिकतम होता है तथा यह (OP) के बराबर होता है।
  • पादप कोशिकाओं में स्फीति दाब का मान प्राय: शून्य (0) से परासरण दाब (O.P.) के मध्य होता है।
  • कोशिकाओं के जीवद्रव्य कुचंन (plasmolysis) के समय स्फीति दाब का मान ऋणात्मक (-ve) माना जाता है।

विभिन्न स्थिति में DPD

आंशिक स्फीत कोशिका या सामान्य कोशिका

DPD = OP – TP

पूर्ण स्फीत कोशिका

यदि किसी कोशिका को शुद्ध जल में रख दें तो अन्तःपरासरण (कोशिका में जल प्रवेश करना) होगा। फलस्वरूप कोशिका में स्फीति दाब उत्पन्न होगा। स्फीति दाब के कारण कोशिका फूलने लगती है। स्फीति दाब बढ़ते-बढ़ते परासरण दाब (O.P.) के बराबर (OP = TP) हो जाता है।

DPD = OP – TP

OP = TP

OP – TP = 0

DPD = 0

विसरण दाब न्यूनता (DPD) शून्य होती है तो कोशिका पूर्ण रूप से स्फीत (turgid) अवस्था में होती है।

 

श्लथ कोशिका में (In Flaccid Cell)

अगर कोशिका श्लथ (flaccid) अवस्था में है, तब इसका स्फीति दाब (T.P) तथा भित्तिदाब (W.P) दोनों शून्य होगा

अतः

TP = WP = 0

इसलिए DPD = OP

DPD का मान परासरण दाब के बराबर होगा।

 

जीवद्रव्यकुंचित कोशिका (Plasmolysed Cell)

जब कोशिका को अतिपरासरी विलयन में रखते है तो यह जीवद्रव्यकुंचित (plasmolysed cell) हो जाती है इसके स्फीति दाब का मान कम होते-होते ऋणात्मक हो जाता है।

अतः

DPD = OP – TP

[TP= -ve]

DPD = OP – (-TP) = OP + TP

DPD = OP + TP

अत: जीवद्रव्यकुंचित कोशिका में DPD का मान परासरण दाब (OP) से भी अधिक होता है।

कोशिका में जल की मांग या DPD का क्रम

जीवद्रव्यकुंचित कोशिका (Plasmolysed cell) > श्लथ कोशिका (flaccid cell) > आंशिक स्फीत कोशिका (partially turgid cell) > पूर्ण स्फीत कोशिका (fully turgid cell)

 

स्वतंत्र ऊर्जा अभिधारणा या जल विभव अवधारणा (Free Energy Hypothesis or Water Potential Hypothesis)

जल विभव (water potential)

शुद्ध पानी के अणुओं की स्वतन्त्र उर्जा पायी जाती जिसके कारण वे गति करते रहते है।

यदि शुद्ध पानी में विलेय मिला देते है, तो पानी के अणुओं की स्वतन्त्र उर्जा

कम हो जाती है।  स्वतंत्र ऊर्जा में हुई इस कमी को ही जल विभव (water potential) कहते है।

यानि शुद्ध जल तथा विलयन में जल के अणुओं की स्वतंत्र उर्जा के बीच के अन्तर को उस तन्त्र का जल विभव (water potential) कहते हैं।

इसको Ψw से दर्शाते है।

  • शुद्ध पानी का जल विभव अधिकतम होता है। क्योंकि पानी की स्वतन्त्र उर्जा सबसे अधिक होती है।
  • जल में विलेय (नमक, चीनी) डालने पर स्वतन्त्र उर्जा कम हो जाती है तथा जलविभव भी कम हो जायेगा।
  • जल सदैव उच्च जल विभव (High water potential) से निम्न जल विभव (Low water potential) की ओर प्रवाहित होता है।

 

परासरणी विभव या विलेय विभव (Solute potential)

जल विभव अवधारणा के आधार पर परासरण दाब को परासरणी विभव (Osmotic potential) या विलेय विभव (Solute potential) कहते है।

इसको ΨS से दर्शाते है । इसका मान ऋणात्मक (negative) होता है। इसे बार या पास्कल (Pa) में नापते है।

दाब विभव (Pressure potential)

स्फीति दाब (T.P) को स्वतंत्र ऊर्जा अवधारणा में दाब विभव (pressure potential) से व्यक्त करते है। इसे Ψp से दर्शाते है। इसका मान धनात्मक (+ve)  होता है।

इन्हें भी पढ़े

  1. पादपो में रसारोहण (Ascent of Sap)
  2. पुष्पीय पादपो में लैंगिक जनन
  3. जीवविज्ञान की शाखाओं के जनक (Father of Branches of Biology Hindi)

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