नर के लैंगिक अंग (जननांग) – Male Sex Organs

Hello Biology Lovers,आज के हमारे ब्लॉग का शीर्षक है- नर के लैंगिक अंग इसको  नर जनन तंत्र, नर जननांग,


नर जनन तंत्र – Male Reproductive System


नर के लैंगिक अंग में वृषण, वृषण कोष, अधिवृषण, शुक्रवाहक, मूत्र मार्ग, शिश्न तथा सहायक ग्रंथियाँ सम्मिलित है| जिनकी सरंचना और कार्य निम्न प्रकार है-


A)वृषण (TESTES) एकवचन (TESTIS)


नर के लैंगिक अंग में वृषण प्रमुख  जनन ग्रंथियां हैं। ये उदर से बाहर त्वचा व संयोजी उतकों की बनी एक थैली के भीतर स्थित होते हैं जिन्हें वृषण कोष (SCROTUM) कहते हैं। वृषणकोष सामान्य नाम अंडकोश/फोता है।
संरचनात्मक रूप से प्रत्येक वृषण श्वेत तंतु युक्त संयोजी ऊतकों के एक संपुट में बंद रहता हैं सबसे बाहर TUNICA VAGINALIS  मध्य में  TUNICA ALBUGINEA सबसे अन्दर TUNICA VASCULOSA होता है  प्रत्येक वृषण में अनेक अत्यधिक कुंडलित नलिकाएं होती हैं जिन्हें शुक्रजनक नलिकाएं(SEMINIFEROUS TUBULES) (संख्या 750-1000) कहते हैं शुक्रजनक नलिकाएं में सरटोली तथा नर जर्म कोशिका होती है सरटोली कोशिका शुक्राणुओं को पोषण देती है तथा नर जर्म कोशिका  शुक्राणुओं का निर्माण करती है। शुक्र जनक नलिकाओं के बीच में संयोजी ऊतक विद्यमान रहते हैं जहाँ अंतरालीय कोशिकाओं के गुच्छे स्थित होते हैं इन्हें लीडिग कोशिकाएं कहा जाता है। ये कोशिका नर लिंग हार्मोन  टेस्टोस्टेरॉन का स्राव करती हैं। टेस्टोस्टेरॉन नर में प्राथमिक व गौण लैंगिक लक्षणों को बनाए रखता है।
जनन के समय वृषण जब उदर गुहा के बहार वृषण कोष में नहीं आते तो इसे CRYPTORCHIDISM  कहते है


B)वृषण कोष(SCROTUM)


वृषण कोष ताप नियंत्रक की भाँति  कार्य करता है। यह वृषण का तापमान शरीर के तापमान  से 2-3 ºC नीचे बनाये रखता है। जो तापमान शुक्राणुओं के परिवर्धन के लिये अनुकूल होता है।


C)अधिवृषण(EPIDIDYMIS)


प्रत्येक अधिवृषण एक लंबी अत्यधिक कुंडलित नली है जो वृषण से जुड़ी रहती है और वृषण कोष के अन्दर विद्यमान रहती है। अधिवृषण में शुक्राणु संचित रहते हैं। अधिवृषण शुक्राणुओं के वृषण से परिवहन के लिये एक मार्ग प्रदान करता है।


D)शुक्रवाहक(VAS DEFERENS)


प्रत्येक अधिवृषण से नली के रूप में एक शुक्रवाहक निकलता है। यह मूत्राशय के ऊपर से होता हुआ आगे बढ़कर उदर के भीतर पहुँचता है और शुक्राशय की वाहिका से मिलकर स्खलनीय वाहिका (EJACULATORY) का निर्माण करता है। स्खलनीय वाहिका मूत्र मार्ग में खुल जाती है।


E)मूत्र मार्ग(URETHRA)


नर में मूत्र मार्ग लगभग 15-20 सेमी लंबा व तीन भागों में विभेदित होता है। अग्रवर्ती प्रोस्टेट भाग जो कि प्रोस्टेट ग्रंथि से गुजरता हैं एक मध्यवर्ती झिल्लीदार भाग व पश्चवर्ती शिश्नीय भाग जो मैथुन अंग (COPULATORY ORGAN)निष्कासन शिश्न से होकर गुजरता है। मूत्र मार्ग शुक्र एवं मूत्र दोनों के लिये मार्ग का कार्य करता है।


D)शिश्न(PENIS)


शिश्न एक बेलनाकार स्पंजी पेशीय व अत्यधिक संवहनी रुधिर वाहिकाओं नर का मैथुन
अंग हैं मूत्र मार्ग इसके केन्द्र से होकर गुजरता है और शुक्र व मूत्र दोनों के लिये साझा पथ
का कार्य करता है। लैंगिक उत्तेजना के दौरान स्पंजी ऊतकों में रुधिर भर जाने से यह कड़ा व खड़ा हो जाता है। बाह्य रूप से शिश्न त्वचा से ढका रहता है। शिश्न का शीर्ष नरम व अत्यधिक संवेदनशील होता है। इसे शिश्नमुण्ड(GLANS PENIS)कहते हैं। यह त्वचा के एक ढीले वलन से ढका रहता है जिसे शिश्नमुण्डच्छद(FORE SKIN) कहते हैं। यह आंकुचनशील(ERECTABLE) है।


E)सहायक ग्रंथियाँ (ASSOSARY GLAND)


नर के लैंगिक अंग में निम्न सहायक ग्रंथियाँ पायी जाती है –


1) शुक्राशय(SEMINAL VESICLE)


इसे UTEROUS MASCULINS भी कहते है शुक्राशय      का  एक  जोड़ा  मूत्राशय  के आधार  पर  विद्यमान  होता  है।  यह    शुक्राणुओं  का संचय  करते है जो कि वृषण से निकलते है और शुक्रीय तरल कर स्राव करते हैं शुक्रीय तरल श्यान तरल होता है जो शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करता है। यह स्राव शिश्न से स्खलित शुक्र से बाहर  निकलने  वाला  शुक्र  का 40-80% प्रति शत  भाग  होता  है।


2) पुरस्थ/प्रोस्टेट ग्रंथि(PROSTATE)


प्रोस्टेट ग्रंथि मूत्र मार्ग के पहले भाग को चारों ओर से घेरे रहती है। यह एक क्षारीय तरल का स्राव करती है जो मूत्राशय में विसर्जित होता है। यह तरल शुक्राणुओं को जीवित रखता है और उन्हें तेजी से तैरने में सहायता प्रदान करता है। पुरस्थ ग्रंथि व स्राव स्खलित पदार्थ का 5-30 प्रति शत भाग होता है।


3) काउपर ग्रंथियाँ(COWPERS GLAND)


इसे BULBO URETHRAL GLAND  भी कहते है ये युग्मित ग्रंथियाँ है जो प्रोस्टेट ग्रंथि के नीचे विद्यमान रहती हैं और प्रोस्टेट ग्रंथि के उस भाग से थोड़ी दूरी पर मूत्र मार्ग से मिलती हैं। काउपर ग्रंथियाँ एक सफेद श्यान क्षारीय स्राव निकालती है जो श्लेष्मा. सा होता है और स्नेहक का कार्य करता है।

 


 

नर के लैंगिक अंग

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