कवक जगत (फफूंद)

Kingdom Fungi in Hindi कवक जगत (फफूंद)

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इस जगत में  बहुकोशिकीय यूकेरियोटिक, विषमपोषी, बीजाणु उत्पादन करने वाले जीव आते हैं।

Mycology- कवक का अध्ययन करना माइकोलॉजी कहलाता है।

पीयर एन्टोनियों मिशेलि (Pier Antonio Micheli) को माइकोलॉजी का जनक (father of mycology) कहते हैं। डी बेरि (de Bary) को आधुनिक माइकोलॉजि का जनक (father of modern mycology) कहते हैं।

भारतीय कवक विज्ञान का जनक बटलर (Butler) को कहते है।

 

कवक के सामान्य लक्षण (General Characteristics of Fungus)

आवास (Habitat)

ये सर्वव्यापी होते हैं, तथा वायु, जल, मृदा में तथा जन्तुओं तथा पादपों पर होते हैं। ये प्रायः स्थलीय होते हैं। ये गर्म (Warm) तथा आर्द्र (Humid) स्थानों में वृद्धि करते हैं।

पोषण (Nutrition)

पोषण विषमपोषी होता है, जिसमें मृतपोषी, परजीवी तथा सहजीवी सम्मिलित है।

ये वृक्ष की छाल, गोबर, काष्ठ, जली हुई काष्ठ तथा कीरेटिनीकृत पदार्थ (उदा.-बाल, सींगों) में वृद्धि करते हैं, उगने के आधार पर निम्न टर्म्स काम में लेते है

  1. कॉर्टिकोलस (corticolous) – छाल (bark)पर उगने वाले फंगस
  2. कॉप्रोफिलस (coprophilous) – गाय के गोबर (cow dung)पर उगने वाले फंगस
  3. एपिजाइलिक (epixylic) – काष्ठ (wood)पर उगने वाले फंगस
  4. जाइलोफिलस (xylophilous) – जली हुई काष्ठ (burnt wood) पर उगने वाले फंगस
  5. कीरेटिनोफिलस (keratinophilous) – कीरेटिन (keratin) जैसे उदा.-बाल, सींगों पर उगने वाले फंगस

 

कोशिका एवं शरीर (Cell and body)

कवकों का शरीर अगुणित होता है। ये बहुकोशिकीय होते हैं। लेकिन यीस्ट तथा सिन्काइट्रियम (Yeast and Synchytrium) एक कोशिकीय होते है।

कवकीय शरीर धागे समान लम्बी नलिकीय संरचनाओं का बना होता है, जिसे हाइफी (hyphae) कहते हैं। एक-दूसरे के साथ ये क्रिस-क्रॉस नेटवर्क (जाल) बनाता है, जिसे माइसीलियम (mycelium) कहते हैं।

हाइफी अपटीय (aseptate) तथा बहुकेन्द्रकीय (multinucleate) हो सकते हैं। ऐसे हाइफी संकेन्द्रकी (coenocytic) कहलाते हैं।

अधिकांश कवकों में माइसीलियम पटीय (septate) तथा शाखित (Branched) होते है। पट (Septum) हाँलाकि पूर्ण नहीं होते लेकिन छिद्र होते हैं, जिनके द्वारा सम्पर्कित कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य की निरन्तरता बनी रहती है।

पटिय / सेप्टेट मायसेलियम में अलग-अलग कोशिकाओं में एक केन्द्रक होता है जो मोनोकैरियोटिक (Monokaryotic) कहलाती है यह प्राथमिक मायसेलियम की विशेषता है। कभी – कभी कोशिकाओं में दो केन्द्रक होते है,  जो एक मध्यवर्ती चरण है ये द्वितीयक मायसेलियम में होता है।

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पट (septum) सरल केन्द्रिय छिद्र होते हैं, जैसे की एस्कोमाइसीटीज में होते हैं, किन्तु उच्च कवकों जैसे बेसिडियो माइसीटीज में पट डोलिपोर (dolipore septum) होता है, जिसमें केन्द्रीय छिद्र में ढ़ोलाकार वृद्धि होती है।

 

कवकों के हाइफा की कोशिका भित्ति काइटिन या कवकीय सेल्युलॉज (chitin or fungal cellulose) की बनी होती है, जो कि पोलिसेकेराइड (polysaccharide) है, इसमें नाइट्रोजनीकृत यौगिक होता है, तथा यह आधारीय रूप से एसीटाइलग्लुकोसामिन (acetylglucosamine) का बना होता है।

कोशिकाओं में एकल सिस्टर्नी (unicisternal) की गोल्जी काय होती है।

सोमेटिक कोशिकाओं में समसूत्री विभाजन केरियोकोरेसिस प्रकार (अन्तः केन्द्रीय तर्कु निर्माण के साथ समसूत्रण) का होता है।

कवक का जीवनचक्र (Life cycle of fungus)

अधिकांश कवकों के जीवनचक्र में दो अवस्थाएँ होती है-

  1. कायिक या स्वांगीकृत अवस्था (vegetative or assimilative phase)
  2. प्रजननिक प्रावस्था (reproductive phase)

 

कायिक या स्वांगीकृत अवस्था (vegetative or assimilative phase)

कायिक अवस्था में कवक सूक्ष्मदर्शी होती है, व धरातल में छिपी होती है, तथा नग्न आँखों से देखना कठिन है।

 

प्रजननिक प्रावस्था (reproductive phase)

कवक कायिक अवस्था में परिपक्वता ग्रहण करने के बाद प्रजननिक अवस्था में जाती है।

एककोशिकीय यीस्ट में एक ही कोशिका स्वांगीकृत तथा प्रजननिक दोनों कार्य करते हैं।

कवकीय काय का ऐसा प्रकार जिसे सम्पूर्ण कोशिका प्रजननिक संरचनाओं में रूपान्तरित होती है, होलोकार्पिक (holocarpic) कहलाती है।

कवक काय जिसमें माइसीलियम प्रजननिक संरचनाओं के विकास में भाग लेता है, यूकार्पिक (eucarpic) कहलाता है।


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कवक में प्रजनन (Reprocuntion in Fungus)

सभी कवक  तीनों विधियों द्वारा प्रजनन करते हैं, जो कायिक, अलैंगिक तथा लैंगिक है।

कायिक प्रजनन (Vegetative reproduction)

यह निम्न विधियों द्वारा होता है-

विखण्डीकरण (Fragmentation)

माइसीलियम यांत्रिक आघातों, सड़ने या कुछ अन्य कारणों के कारण दो या अधिक खण्डों में टूट जाता है। प्रत्येक खण्ड स्वतन्त्र माइसीलियम में वृद्धि करता है।

द्विखंडन (Fission)

कायिक कोशिका दो संतति कोशिकाओं में सरल विभाजन द्वारा बंट जाती है।

मुकुलन (Budding)

कुछ कवक जैसे यीस्ट छोटी बर्हीवृद्धि उत्पन्न करते है, जिसे कलिका कहते हैं। बाद में कलिकाएँ जनक कोशिका से पृथक हो जाती है, तथा नई व्यष्ठियाँ उत्पन्न होती है।

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कवकों में अलैंगिक प्रजनन (Asexual reproduction in fungi)

यह बीजाणुओं (spores) द्वारा होता है। बीजाणु एक कोशिकीय विशिष्ट संरचनाएँ है, जो अपने जनक जीव से पृथक होकर वितरित तथा अंकुरित (dispersed and germinate) होते हैं, तथा उपयुक्त पदार्थ पर गिरने के बाद नया माइसीलियम उत्पन्न करते हैं।

कवकों में अलैंगिक प्रजनन के दौरान उत्पन्न बीजाणु समसूत्री विभाजन (mitotic division) द्वारा निर्मित होते हैं, तथा माइटोस्पोर (mitospores) कहलाते हैं।

बीजाणु के विभिन्न प्रकार निम्न है-

चलबीजाणु (Zoospore)

अनेक जलीय कवक सदस्य चलबीजाणु (Zoospore) उत्पन्न करते हैं। इनकी उत्पत्ति बीजाणु धानी (sporangium) में अंतर्जात (endogenously) रूप से होती है। ये अंकुरित होकर नए माइसीलियम बनाते हैं। ये दो प्रकार के हो सकते है-

  1. एककशाभिकीय चलबीजाणु (Uniflagellate Zoospore)
  2. द्विकशाभिकीय चलबीजाणु (Biflagellate Zoospore)

 

एककशाभिकीय चलबीजाणु (Uniflagellate zoospores)

कभी-कभी जूस्पोर एककशाभिकीय हो सकते हैं, उदाहरण-सिन्काइट्रियम (Synchytrium)

 

द्विकशाभिकीय चलबीजाणु (Biflagellate zoospores)

इनका आकार नाशपाती जैसा या पाइरिफॉर्म (Pyriform) होता है इनके जो अग्रस्थ सिरों पर 2 कशाभिका होती हैं। उदाहरण-सेप्रोलेग्निया (Saprolegnia), पाइथियम (Pythium)

 

Biflagellate zoospores दो प्रकार के होते हैं, प्राथमिक चलबीजाणु (Primary zoospore) नाशपाती के आकार या पाइरीफॉर्म होते है इनमें 2 फ्लैजिला अग्रस्थ सिरों पर होती हैं और द्वितीयक चलबीजाणु (Secondary zoospore) गुर्दे के आकार या बीन के आकार के होते हैं, जिसमें दो पार्श्व रूप से फ्लैजिला होते हैं। दो प्रकार के जूस्पोर होने की इस घटना को डाईप्लैनेटिज़्म (Diplanetism) कहा जाता है।

 

अचलबीजाणु (Aplanospore / Sporangiospores)

स्पोरेन्जियोस्पोर या अचलबीजाणु पतली भित्ति युक्त अचल बीजाणु होते हैं, जो अनुकूल परिस्थितियों के दौरान स्पोरेन्जियम में अर्न्तजात रूप से उतपन्न होते हैं, जो मुक्त होने के बाद नया माइसीलियम उत्पन्न करते हैं। उदाहरण-राइजोपस (Rhizopus), म्युकर (Mucor)

कोनिडिया (Conidia)

कोनिडिया अचल, पतली भित्ति वाले बर्हिजात बीजाणु होते हैं, जो सीधे हाइफी के शीर्ष पर उत्पन्न होते हैं, कॉनिडियोफोर कहलाते हैं।

ये कॉनिडियोफोर पर श्रृँखला में व्यवस्थित होते हैं, उदा. एस्परजिलस (Aspergillus) तथा पेनिसिलियम (Penicillium)।

क्लेमाइडोस्पोर (Chlamydospore)

यह मोटी भित्ति से ढके हुए बीजाणु होते हैं। जो प्रतिकूल परिस्थितियों में बनते हैं और अनुकूल परिस्थितियां आने पर अंकुरित होकर नए कवक का निर्माण करते हैं।

ओड़िया (Oidia)

प्रचुर शर्करा युक्त माध्यम (sugar rich medium) में कवको को रखने पर इनमें मोटी भित्ति युक्त अचलबीजाणु का निर्माण होता है।

 

कवकों में लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction in fungus)

कवक में लैंगिक प्रजनन अपह्वासित (reduced) होता है, तथा दो संलयित युग्मकों द्वारा होता है।

इसमें तीन अवस्थाएँ सम्मिलित है :

प्लाज्मोगेमी (Plasmogamy)

इस दौरान दो अलग-अलग कवक के हाईफी एक दूसरे के समीप आते हैं और उनके दो अगुणित प्रोटोप्लास्ट (Haploid protoplast) के बीच संलयन होता है, जिसके कारण उनका जीवद्रव्य एक दूसरे से जुड़ जाता है इसे प्लाज्मोगेमी कहते है।

हॉलाकि एस्कोमाइसीटीज तथा बेसिडियोमाइसीटीज में मध्यवर्ती डाईकेरियोटिक (n + n) अवस्था होती है। इस अवस्था को डाईकेरियोफेज (dikaryophase) कहते हैं।

केरियोगेमी (Karyogamy)

प्लाज्मागेमी के बाद दोनों कोशिकाओं का केंद्रक आपस में जुड़ते हैं। दो अगुणित केन्द्रक (Haploid Nucleus) जो प्लाज्मोगेमी में एक-दूसरे के साथ आते हैं, संलयित होकर द्विगुणित युग्मनज (Diploid Zygote) उत्पन्न करते हैं।

अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

द्विगुणित युग्मनज (Diploid Zygote) में अपह्वासित विभाजन (Reduced Division / अर्द्धसूत्री विभाजन / Meiosis) होता है, जिसमें गुणसूत्रों की आधी संख्या आधी हो जाती है।

 


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कवकों का वर्गीकरण (Classification of Kingdom Fungi)

माइसीलियम की बाह्यआकारिकी, बीजाणु निर्माण की विधि तथा फलनकाय आदि के आधार पर कवकों का वर्गीकरण किया गया है-

  1. फाइकोमाइसिटिज (Phycomycetes)
  2. एस्कोमाइसिटीज (Ascomycetes)
  3. बेसिडियोमाइसिटीज (Basidiomycetes)
  4. ड्यूटेरोमाइसिटीज (Deuteromycetes)

 

फाइकोमाइसिटिज (Phycomycetes)

  1. इनको शैवाल कवक (Algal fungi) भी कहा जाता है।
  2. ये सड़ी-गली लकड़ियों, नम तथा सीलने वाले स्थानों पर पाए जाते हैं।
  3. उनका कवकजाल (mycelium), अपटीय (Asepatate) तथा बहूकेंद्रिक (Multicellular) होता है।
  4. इन में अलैंगिक जनन चल अथवा अचल बीजाणु द्वारा होता है चल तथा अचल बीजाणु की उत्पत्ति बीजाणु धानी में अंतर जात होती है यह सब युग्म की विषम युग्म की हो सकते हैं
  5. उदाहरण – राइजोपस, म्युकर, एल्बुगो, सिंकाईट्रियम, फाइटोफ्थोरा, स्क्लेरोस्पोरा ग्रैमिनिकोला, सेपरोलेग्निया

 

 

एस्कोमाइसिटीज (Ascomycetes)

  1. इसको थैली फंजाई (Sac fungi) भी कहते हैं।
  2. यह मृतजीवी (Saprophyte), परजीवी (Parasites) अपघटक (Decomposer) या शम्लरागी (coprophilous) होते हैं।
  3. इनका कवकजाल (Mycelium) पटीय (Septate) तथा शाखित (Branched) होता है।
  4. इनमें अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction) कोनिडिया (Conidia) द्वारा होता है। कोनिडियमधर पर बहीर्जातिय उत्पन्न होते हैं।
  5. इनमें लैंगिक बीजाणु (Sexual spore) एस्कस कहलाते हैं। जो एस्कोकार्प (Ascocarp) में अंतर्जातीय (Endogenously) रूप से उत्पन्न होते हैं।
  6. उदाहरण – एस्पेरजिलस, न्यूरोस्पोरा, क्लेविसेप्स, पेज़िज़ा, पेनिसिलियम, प्लियोस्पोरा, मोरेल, ट्रफल्स, यीस्ट, पायरोनिमा, एस्कोबोलस, मोर्चेला / मोर्सेला

 

बेसिडियोमाइसिटीज (Basidiomycetes)

  1. यह मशरूम (Mushroom), ब्रेक्टफंजाई , पफबाॉल फंजाई, Club fungi कहलाते हैं।
  2. यह मिट्टी, वृक्ष के ठूंठ एवं लटठों पर उगते अथवा परजीवी होते हैं।
  3. इनका कवकजाल (Mycelium) पटीय (Septate) तथा शाखित (Branched) होता है।
  4. इनमें अलैंगिक बीजाणु (Asexual spores) नहीं पाए जाते।
  5. इनमें लैंगिक बीजाणु (Sexual spore) बेसिडियम कहलाते हैं, जो बेसेडियोकार्प पर बहिर्जात रूप से लगते हैं‌।
  6. उदाहरण – एगेरिकस, पक्सिनिया, ऑस्टिलागो, टॉडस्टूल (कुकुरमुत्ता / Amanita caesarea), लाइकोपर्डन ।

 

ड्यूटेरोमाइसिटीज (Deuteromycetes)

  1. यह अपूर्ण-कवक (The Fungi Imperfecti) होते हैं। ड्यूटेरोमाइसेट्स एक कृत्रिम वर्ग है
  2. यह मृतजीवी (Saprophytes) अथवा परजीवी (Parasites) होते हैं।
  3. इनका कवकजाल (Mycelium) पटीय (Septate) तथा शाखित (Branched) होता है।
  4. इनमें केवल अलैंगिक प्रावस्था (Asexual Phase) ही ज्ञात होती है। इनमें कोनिडिया अलैंगिक बीजाणु बनते है।
  5. इनकी लैंगिक अवस्था (Sexual Phase) ज्ञात होने पर इनको एस्कोमाइसिटीज अथवा बेसिडियोमाइसिटीज में रख दिया जाता है।
  6. उदाहरण – आल्टरनेरिया, ट्राईकोडर्मा, कोलीटोट्राइकम, फुसैरियम, Cercospora

 

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Hamid Ali
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