वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) तथा बिंदुस्राव (Guttation) | Aliscience

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) तथा बिंदुस्राव (Guttation)

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) तथा बिंदुस्राव (Guttation)

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)

पादप के वायवीय भाग जैसे जड़, तना, पत्ती आदि से पानी का वाष्प के रूप में बाहर निकलना वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) कहलाता है। यह पादपों के लिए एक अनिवार्य बुराई (Necessary Evil) है।

सर्वाधिक वाष्पोत्सर्जन मिसोफाइट पादपों में तथा सबसे कम वाष्पोत्सर्जन मरूद्भिद पादपों में होता है।

Contents

वाष्पोत्सर्जन के प्रकार (Types Of Transpiration)

वाष्पोत्सर्जन मुख्यतः तीन प्रकार का होता है-

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रंध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal Transpiration)

पादप की पत्तियों तथा अन्य कोमल अंगों पर उपस्थित रंध्रो के द्वारा होने वाला वाष्पोत्सर्जन, रंध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal Transpiration) कहलाता है। लगभग 90% वाष्पोत्सर्जन रंध्रीय ही होता है।

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उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular Transpiration)

पादपों की पत्तियों की ऊपरी त्वचा क्यूटिकल से ढकी रहती है। यदि क्यूटिकल क्षतिग्रस्त या बहुत पतली होती है। तो वहां से जल वाष्प के रूप में निकलने लगता है। जिसे उपत्वचीय या क्यूटीक्यूलर वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। लगभग 9% वाष्पोत्सर्जन यह होता है।

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वातरंध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular Transpiration)

काष्ठीय तनों तथा फलों पर वातरंध्र पाए जाते हैं। जिनके द्वारा होने वाला वाष्पोत्सर्जन, वातरंध्रीय वाष्पोत्सर्जन कहलाता है। यह केवल 1% ही होता है।

शैवाल, कवक, तथा जलनिमग्न पादपों में वाष्पोत्सर्जन नहीं होता।

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रन्ध्रों के आधार पर पत्ति के प्रकार (Types of Leaves According to Stomata)

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अधोरन्ध्री पत्ती (Hypostomatic Leaves)

रन्ध्र जब पत्ति की केवल निचली सतह पर सीमित होते हैं।तो ऐसी पत्तियां अधोरन्ध्री पत्ती कहलाती है।

इसको सेब या शहतूत प्रकार भी कहते हैं।

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उभयरन्ध्री पत्ती (Amphistomatic Leaves)

जब रंध्र पत्ती की दोनों सतहों पर समान रूप से उपस्थित होते हैं। तो इसे उभयरन्ध्री पत्ती कहते हैं। इसे जई प्रकार भी कहा जाता है।

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अधिरन्ध्री पत्ती (Epistomatic Leaves)

यदि रंध्र केवल ऊपरी सतह पर ही पाए जाते हैं। तो इसे अधिरन्ध्री पत्ती कहते हैं। ऐसा जलीय पादपों में होता है। जैसे इसे वाटर लिली या कुमुदिनी प्रकार भी कहते हैं।

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अरन्ध्री पत्ती (Astomatic Leaves)

पत्तियों पर अंदर अनुपस्थित होते हैं। ऐसा जलमग्न (जल में डूबे) पादपों में होता है।

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रंध्र की संरचना (Structure of Stomata)

रंध्र एक सूक्ष्म छिद्र होता है। जिसके जो दो वृक्काकार द्वार कोशिकाओं (Guard Cell) द्वारा घिरा रहता है। इस छिद्र को रंध्रीय छिद्र (Stomatal Pore) कहते हैं।

द्वार कोशिकाओं को रक्षक कोशिकाएं भी कहा जाता है। एकबीजपत्री पादपों में इनका आकार डंबलाकार (Dumbbell Shaped) होता है।

प्रत्येक द्वार कोशिका की बाह्य भित्ति पतली तथा आंतरिक भित्ति मोटी तथा प्रत्यास्थ होती है। जब यह द्वार कोशिकाएं स्फीत होती है, अथवा फुलती है। तो रंध्र खुल जाते हैं। इनके श्लथ अथवा पिचकने पर रन्ध्र बंद हो जाते हैं।

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration in Hindi)

Source – NCERT

द्वार कोशिकाओं के चारों ओर स्थित बाह्यत्वचा की अन्य कोशिकाएं सहायक कोशिकाएं (Subsidiary Cells) कहलाती है। जो रंध्रो के खुलने व बंद होने में सहायता करती है।

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गर्तीय रन्ध्र (Sunken Stomata)

मरूद्भिद पादपों में रंध्र अंदर की ओर धसे हुए होते हैं। इनमें सहायक कोशिकाएं द्वार कोशिकाओं के ऊपर की ओर स्थित होती है। ऐसे रंध्र गर्तीय रन्ध्र (Sunken Stomata) कहलाते हैं।

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रन्ध्रो के खुलने व बंद होने की क्रियाविधि (Mechanism of closing and opening of stomata)

इसके लिए विभिन्न प्रकार की परिकल्पनाएं दी गई है। जो निम्न प्रकार है-

  1. स्टार्च शर्करा परिकल्पना (Starch Sugar Hypothesis)
  2. स्टीवार्ड की परिकल्पना (Steward Hypothesis)
  3. सक्रिय पोटेशियम आयन सिद्धांत (Active Potassium Ion Hypothesis)
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मांड शर्करा परिकल्पना (Starch Sugar Hypothesis)

यह जेडी सायरे के द्वारा दी गई। इसके अनुसार दिन के समय कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग प्रकाश संश्लेषण में होने के कारण रक्षक कोशिकाओं में CO2 की मात्रा कम हो जाती है। जिससे इनका pH बढ़ जाता है। अधिक pH पर फास्फोराइलेज एंजाइम सक्रिय हो जाते हैं। जो स्टार्च को ग्लूकोस 1 फास्फेट में बदल देते हैं। जिसके कारण रक्षक कोशिकाओं का DPD बढ़ जाता है। सहायक कोशिकाओं से जल रक्षक कोशिकाओं में प्रवेश करता है। जिससे यह स्फीत हो जाती है। और अंदर खुल जाते हैं।

रात के समय प्रकाश संश्लेषण नहीं होने के कारण CO2 की वृद्धि हो जाती है। जिससे रक्षक कोशिकाओं का pH कम हो जाता है। और एंजाइम निष्क्रिय हो जाता है। जिससे ग्लूकोज 1 फास्फेट पुन: स्टार्च में बदल जाता है। जिससे इनका DPD कम हो जाता है। जल बाहर निकल आता है। ये कोशिकाएं श्लथ हो जाती है। जिसे रंध्र बंद हो जाते हैं।

कुछ एकबीजपत्री पादप जैसे प्याज में द्वार कोशिकाओं में स्टार्च अनुपस्थित होता है। अतः यह मत मान्य नहीं है।

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स्टीवार्ड की परिकल्पना (Steward Hypothesis)

स्टीवार्ड में मांड शर्कारा परिकल्पना में परिवर्तन करके यह कहा कि दिन के समय CO2 की मात्रा कम होने के कारण पीएच अधिक हो जाता है।

जिससे स्टार्च ग्लुकोज 1 फास्फेट में बदलता है। यह ग्लुकोज 1 फास्फेट ग्लुकोज 6 फास्फेट तथा अंत में ग्लुकोज बनाता है।

ग्लुकोज जल में अधिक घुलनशील होता है। जिनके कारण कोशिका रस की सांद्रता बढ़ जाती हैं।

जिससे समीपस्थ सहायक कोशिकाओं से जल द्वार कोशिका में प्रवेश करता है। वह स्फीत हो जाती है। जिससे रंध्र खुल जाते हैं।

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सक्रिय पोटेशियम आयन सिद्धांत (Active Potassium Ion Hypothesis)

यह सिद्धांत इमामूरा तथा फ्युजीनो द्वारा दिया गया तथा लेविट ने इनमें रूपांतरण किया। इसके अनुसार दिन के समय कोशिकाओं में मैलिक अम्ल बनता है। यह मैलिक अम्ल अपघटित होकर हाइड्रोजन आयन व मैलेट बनाता है।

कोशिका में एंटीपोर्ट प्रक्रिया द्वारा हाइड्रोजन आयन द्वार कोशिका से बाहर प्रवेश करते हैं। और पोटेशियम कोशिका में प्रवेश करते हैं। यह पोटेशियम द्वार कोशिका में उपस्थित मैलेट से क्रिया करके पोटेशियम मैलेट बना लेते हैं।

जिससे द्वार कोशिकाओं की परासरणी सांद्रता बढ़ जाती है। जिससे समीपस्थ सहायक कोशिकाओं से जल द्वार कोशिका में प्रवेश करता है। यह फूल जाती है। जिसे रंध्र खुल जाते हैं।

रात्रि के समय प्रकाश संश्लेषण नहीं होता। अतः CO2 की सांद्रता बढ़ जाती है। जिससे मैलिक अम्ल में स्टार्च में परिवर्तित हो जाता है। जिससे द्वार कोशिकाओं की परासरणी सांद्रता कम हो जाती है। जिससे जल द्वार कोशिका से सहायक कोशिकाओं की ओर गमन करता है। जिससे द्वार को श्लथ हो जाती है। और रंध्र बंद हो जाते हैं।

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वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting Transpiration)

वाष्पोत्सर्जन को निम्न कारक प्रभावित करते हैं-

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प्रकाश (Light)

प्रकाश की उपस्थिति के कारण अंदर खुलते अथवा बंद होते हैं। जो वाष्पोत्सर्जन की दर को परिवर्तित करते हैं।

प्रकाश से तापमान में वृद्धि होती है। जिससे वाष्पोत्सर्जन की दर भी बढ़ती है।

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तापमान (Temperature)

तापमान बढ़ने पर वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ती है। क्योंकि वायुमंडल की आपेक्षिक आद्रता कम हो जाती है। अतः पादप अपने चारों और आद्रता को बनाए रखने के लिए वाष्पोत्सर्जन अधिक करते हैं।

वायु तेज वायु के कारण पत्तियों पर उपस्थित नमी कम हो जाती है। जिससे पत्तियों के चारों ओर का वातावरण शुष्क हो जाता है। अतः वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है।

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मृदा में उपस्थित प्राप्य जल की मात्रा (Available Water in Soil)

मृदा में जल की मात्रा अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है। तथा जल की मात्रा कम होने पर वाष्पोत्सर्जन कम होता है।

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पर्ण की संरचना (Structure of Leaf)

पत्तियों की बाह्यत्वचा पर पाए जाने वाले रंध्र, क्यूटिकल, रोम आदि वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करते हैं। अगर रन्ध्रों की संख्या अधिक होती है। तो वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है। यदि पत्तियों में गर्ती रन्ध्र पाए जाते हैं। तो वाष्प उत्सर्जन कम होता है। क्यूटिकल का आवरण भी वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है। मूल प्ररोह अनुपात मूल तथा प्ररोह के अनुपात में वृद्धि से वाष्पोत्सर्जन की दर में भी वृद्धि होती है।

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पत्तियों का दिक् विन्यास (Orientation of Leaf)

यदि पतियों का दिक् विन्यास सूर्य से आपतित किरण के समकोण होता है। तो वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक होती है।

लेकिन यदि आपतित किरण के समांतर दिक् विन्यास होता है। तो वाष्पोत्सर्जन की दर कम होती है।

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वाष्पोत्सर्जन का महत्व (Importance of Transpiration)

वाष्पोत्सर्जन को पादपों के लिए आवश्यक बुराई कहा जाता है। क्योंकि इसमें जल की हानि होने से पादप के लिए हानिकारक है। परंतु वाष्पोत्सर्जन के कारण कई कार्य संपन्न होते हैं। अतः यह लाभदायक भी है।

जैसे कि वाष्पोत्सर्जन के कारण खिंचाव उत्पन्न होता है। जो रसारोहण में सहायता करता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण अतिरिक्त जल का निष्कासन किया जा सकता है।

वाष्पोत्सर्जन पत्ति के तापमान को भी कम बनाए रखता है।

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बिंदुस्राव (Guttation)

पत्तियों की शिराओं के अन्तिम भाग से जल का छोटी-छोटी बूंदों के रूप में निकलना बिंदुस्राव कहलाता है। ऐसा सुबह के वक्त देखा जा सकता है।

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